पटना।बिहार में इस वक्त जहां एक ओर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान तेजी पर है, वहीं दूसरी ओर इसे लेकर सियासी हलचल भी तेज हो गई है। एक ओर राजनीतिक दल इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं, तो दूसरी ओर चुनाव आयोग ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा है कि “अब तक 1 करोड़ से ज्यादा गणना फॉर्म जमा किए जा चुके हैं और लगभग 94 प्रतिशत फॉर्म वितरित भी हो चुके हैं।”
चुनाव आयोग के मुताबिक, 24 जून 2025 तक बिहार में कुल 7.90 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से 13.19 प्रतिशत यानी 1,04,16,545 फॉर्म प्राप्त हो चुके हैं, जबकि 7,38,89,333 फॉर्म यानी 93.57% फॉर्म घर-घर जाकर वितरित किए जा चुके हैं।
SIR की जमीनी हकीकत – आंकड़ों की जुबानी
इस प्रक्रिया में करीब 77,895 बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) सक्रिय हैं, जो घर-घर जाकर न सिर्फ फॉर्म भरवा रहे हैं बल्कि मतदाताओं की लाइव तस्वीरें भी लेकर अपलोड कर रहे हैं, जिससे लोगों को फोटो स्टूडियो जाने की झंझट से राहत मिल रही है।
भरे गए फॉर्म अब ईसीआई पोर्टल (https://voters.eci.gov.in) और ECINET ऐप पर अपलोड किए जा सकते हैं। साथ ही جزवां या अधूरे फॉर्म भी डाउनलोड के लिए उपलब्ध हैं ताकि उन्हें पूरा कर पुनः अपलोड किया जा सके।
सहयोग का व्यापक नेटवर्क – 4 लाख स्वयंसेवक मैदान में
एसआईआर को सुचारू और समयबद्ध तरीके से सम्पन्न कराने के लिए 20,603 अतिरिक्त बीएलओ की तैनाती की जा रही है। इसके अलावा NCC, NSS और अन्य संस्थानों से जुड़े करीब 4 लाख स्वयंसेवक बुजुर्गों, दिव्यांगों और अस्वस्थ मतदाताओं की मदद कर रहे हैं।
राज्य के स्तर पर 239 ERO, 963 AERO, 38 DEO और CEO खुद निगरानी में जुटे हैं, ताकि किसी भी eligible वोटर का नाम मतदाता सूची से छूटने न पाए।
राजनीतिक दल भी मैदान में – 1.5 लाख से ज्यादा BLA सक्रिय
एसआईआर में राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त 1,54,977 बूथ लेवल एजेंट (BLA) भी सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं। लेकिन इसी भागीदारी को लेकर कुछ दलों ने सवाल भी उठाए हैं। उनका आरोप है कि इस प्रक्रिया में पक्षपात की आशंका है और SIR की पारदर्शिता को लेकर निगरानी की आवश्यकता है।
EC की दो टूक – पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच निर्वाचन आयोग ने साफ किया है कि एसआईआर एक “पूर्णतः पारदर्शी, सहभागितापूर्ण और समावेशी प्रक्रिया” है, जिसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ यह सुनिश्चित करना है कि “कोई भी पात्र मतदाता छूटे नहीं और कोई अपात्र मतदाता शामिल न हो।”
बिहार में एसआईआर सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक भागीदारी का महा-अभियान बन चुका है। हालांकि सियासी हलचल और आरोपों की गूंज के बीच आयोग की पारदर्शिता परखने की चुनौती भी उतनी ही बड़ी है। अब देखना ये होगा कि यह पुनरीक्षण सूची को कितनी विश्वसनीय और अद्यतन बना पाता है — खासकर आगामी चुनावों के लिए।




















