जानकारी के अनुसार, मणिपुर में आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ के दौरान भोजराम साहू ने अद्वितीय साहस का परिचय दिया। आतंकियों के हमले में गोली लगने के बावजूद उन्होंने अदम्य हौसले के साथ मोर्चा संभाले रखा और अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। विषम परिस्थितियों में दिखाई गई इसी वीरता और समर्पण के लिए भारत सरकार ने उन्हें शौर्य चक्र से सम्मानित किया है।
शौर्य चक्र देश का तीसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है, जो राष्ट्र की सुरक्षा और सेवा के दौरान असाधारण साहस का प्रदर्शन करने वाले सैनिकों एवं सुरक्षाकर्मियों को प्रदान किया जाता है। ग्रामीण परिवेश से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर यह सम्मान हासिल करना भोजराम साहू की संघर्षशीलता और दृढ़ संकल्प का प्रमाण है।

भोजराम साहू की इस उपलब्धि से ग्राम ढोरठिमा सहित पूरे क्षेत्र में उत्साह और गर्व का माहौल है। गांव में मानो उत्सव जैसा वातावरण बन गया है। ग्रामीणों, सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और विभिन्न वर्गों के लोगों ने उन्हें शुभकामनाएं देते हुए इसे पूरे जिले के लिए ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण क्षण बताया है।
परिजनों ने बताया कि भोजराम साहू में बचपन से ही देशसेवा का जज्बा था। कठिन परिश्रम और मजबूत इरादों के बल पर उन्होंने सेना में भर्ती होकर अपने सपनों को साकार किया। आज उनकी बहादुरी को राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान परिवार के लिए सबसे बड़ा सम्मान बन गई है।
क्षेत्रवासियों का कहना है कि भोजराम साहू ने यह साबित कर दिया है कि ग्रामीण अंचलों के युवा भी अपनी मेहनत, लगन और साहस के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान स्थापित कर सकते हैं। उनकी सफलता युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी और उन्हें राष्ट्रसेवा के लिए प्रोत्साहित करेगी।
भोजराम साहू की यह उपलब्धि एक बार फिर सिद्ध करती है कि छत्तीसगढ़ की धरती वीर सपूतों की भूमि है। देश की रक्षा के लिए यहां के जवान हर चुनौती का डटकर सामना करते हैं। शौर्य चक्र से सम्मानित होकर भोजराम साहू ने अपने गांव, जिले और प्रदेश का मान बढ़ाया है, जिस पर हर नागरिक को गर्व है।
“भोजराम साहू की वीरता केवल एक सैनिक की बहादुरी की कहानी नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा, समर्पण और साहस का वह उदाहरण है जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।”




















