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हाथ की हड्डी टूटी, जेब में नहीं थे 200 रुपये; जिला अस्पताल में घंटों दर्द से तड़पता रहा घायल, मीडिया पहुंची तो हुआ उपचार

बालोद। जिले के एकमात्र जिला अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। सड़क दुर्घटना में घायल एक युवक को हाथ की हड्डी टूटने के बावजूद समय पर उपचार नहीं मिलने का मामला सामने आया है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि आयुष्मान कार्ड नहीं होने और 200 रुपये की पर्ची कटाने के लिए पैसे नहीं होने के कारण उन्हें तत्काल उपचार से वंचित कर दिया गया। मामला तब चर्चा में आया जब दर्द से परेशान मरीज और उसके साथी मीडिया के पास पहुंचे। इसके बाद अस्पताल प्रबंधन में अचानक हलचल दिखाई दी और घायल के हाथ में प्लास्टर बांधा गया।

जानकारी के अनुसार गुरुर क्षेत्र निवासी टेमन लाल यादव सड़क पर अचानक सामने आई गाय को बचाने के प्रयास में बाइक से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए। दुर्घटना में उनके हाथ में गंभीर चोट आई। परिजनों ने उन्हें तत्काल करहीभदर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर इलाज के लिए जिला अस्पताल बालोद रेफर कर दिया गया।

जिला अस्पताल में हुई जांच और एक्स-रे के बाद चिकित्सकों ने हाथ की हड्डी टूटने की पुष्टि की। इसके बावजूद पीड़ित पक्ष का आरोप है कि उन्हें तत्काल प्लास्टर या अन्य आवश्यक उपचार उपलब्ध नहीं कराया गया। परिजनों का कहना है कि आयुष्मान कार्ड नहीं होने पर जीवन दीप समिति के माध्यम से 200 रुपये जमा करने के लिए कहा गया। आर्थिक तंगी के कारण जब वे राशि जमा नहीं कर सके तो उन्हें दवाइयों की पर्ची देकर अस्पताल परिसर से बाहर निजी मेडिकल दुकान का रास्ता दिखा दिया गया।

घायल मरीज दर्द से कराहता रहा और उपचार की उम्मीद में अस्पताल परिसर में भटकता रहा। आखिरकार मरीज और उसके साथियों ने अपनी समस्या स्थानीय मीडिया के समक्ष रखी। मामला सामने आने के बाद जब अस्पताल प्रबंधन से जवाब मांगा गया तो जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आ गई।

बताया जाता है कि मामले की जानकारी लेने के लिए जब सिविल सर्जन से संपर्क किया गया तो उन्होंने तत्काल अस्पताल पहुंचने में असमर्थता जताई। वहीं मीडिया टीम जब पीड़ित के साथ अस्पताल पहुंची और उपचार नहीं मिलने के संबंध में सवाल उठाए, तब अस्पताल स्टाफ सक्रिय हुआ। आरोप है कि जिन कर्मचारियों ने पहले मरीज को वापस भेज दिया था, उन्हीं के द्वारा बाद में जल्दबाजी में घायल के हाथ में कच्चा प्लास्टर बांधा गया।

यह पूरा घटनाक्रम कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। क्या जिला अस्पताल में आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को तत्काल उपचार मिल रहा है? क्या आपातकालीन स्थिति में भी मरीजों को शुल्क और औपचारिकताओं के कारण भटकना पड़ रहा है? और यदि मीडिया के हस्तक्षेप के बाद उपचार संभव था तो पहले ऐसा क्यों नहीं किया गया?

जिले के लोगों का कहना है कि जिला अस्पताल केवल एक स्वास्थ्य केंद्र नहीं, बल्कि हजारों गरीब और ग्रामीण परिवारों की अंतिम उम्मीद है। ऐसे में यदि सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को भी समय पर उपचार के लिए संघर्ष करना पड़े तो यह व्यवस्था की संवेदनशीलता और जवाबदेही दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

अब जरूरत इस बात की है कि स्वास्थ्य विभाग पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक तथ्यों को सामने लाए तथा यह सुनिश्चित करे कि भविष्य में किसी भी मरीज को आर्थिक अभाव या प्रशासनिक उदासीनता के कारण उपचार से वंचित न होना पड़े।

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