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दूध गंगा में घमासान: किसानों ने प्राधिकृत अधिकारी पर लगाए गंभीर आरोप, कलेक्टर से की जांच और कार्रवाई की मांग

बालोद। जिला मुख्यालय स्थित दुग्ध उत्पादक सहकारी संस्था “दूध गंगा” एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। संस्था से जुड़े पंजीकृत दूध उत्पादक किसानों ने दूध गंगा के प्राधिकृत अधिकारी एवं संचालन व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाते हुए कलेक्टर के नाम संयुक्त कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा है। किसानों ने दूध की कीमत बढ़ाने, लंबित बोनस भुगतान, वित्तीय अनियमितताओं की जांच, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई तथा संस्था का संचालन किसानों के हाथों में सौंपने सहित कई मांगें रखी हैं।
किसानों द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि दूध गंगा के संचालन में पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है और किसानों को महत्वपूर्ण निर्णयों से दूर रखा जा रहा है। किसानों का कहना है कि संस्था उनके जीवन-यापन का प्रमुख आधार है, लेकिन पिछले कुछ महीनों से लगातार ऐसी परिस्थितियां निर्मित हुई हैं जिससे किसानों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।

दूध की कीमत 50 रुपये प्रति किलो करने की मांग

किसानों ने मांग की है कि वर्तमान में उन्हें मिलने वाली दूध की कीमत को बढ़ाकर 44 रुपये से 50 रुपये प्रति किलोग्राम किया जाए। उनका तर्क है कि पशु आहार, दाना, भूसा एवं अन्य सामग्री की कीमतों में पिछले कुछ समय में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है, जबकि दूध की दर उस अनुपात में नहीं बढ़ाई गई है। किसानों का कहना है कि बढ़ती लागत के बीच वर्तमान मूल्य पर दुग्ध उत्पादन करना कठिन होता जा रहा है।
इसके अलावा किसानों ने वर्ष 2025-26 का बोनस तत्काल वितरित करने की भी मांग की है। ज्ञापन में उल्लेख किया गया है कि बोनस भुगतान दो माह से लंबित है, जिससे किसानों में नाराजगी है।

खर्च और वित्तीय लेन-देन की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग

किसानों ने ज्ञापन में आरोप लगाया है कि 9 अप्रैल 2026 को दूध गंगा बंद होने के बाद संस्था में विभिन्न मदों में खर्च किए गए लाखों रुपये की जानकारी किसानों को नहीं दी जा रही है। किसानों ने मांग की है कि संस्था की आय-व्यय, मरम्मत कार्यों तथा विभिन्न मदों में खर्च की गई राशि का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए।
किसानों का कहना है कि उन्होंने सूचना प्राप्त करने के लिए आवेदन भी दिया था, लेकिन अब तक उन्हें आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि संचालक मंडल द्वारा दूध गंगा को कितनी राशि सौंपी गई और उसका उपयोग किस प्रकार किया गया।

मरम्मत कार्यों में अनियमितता का आरोप

ज्ञापन में किसानों ने आरोप लगाया है कि 9 अप्रैल 2026 को दूध गंगा बंद रहने के दौरान मरम्मत और अन्य कार्यों के नाम पर आवश्यकता से अधिक खर्च किया गया। किसानों का दावा है कि कई कार्य बिना लिखित प्रस्ताव और उचित प्रक्रिया के कराए गए, जिससे वित्तीय अनियमितता की आशंका उत्पन्न हुई है। उन्होंने पूरे मामले की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।

प्राधिकृत अधिकारी और प्रबंधक को हटाने की मांग

किसानों ने ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया कि संस्था के संचालन और वित्तीय निर्णयों में किसानों की भागीदारी समाप्त कर दी गई है। उनका कहना है कि 30 दिसंबर 2025 से संस्था के संचालन और वित्तीय मामलों में किसानों को शामिल नहीं किया गया, जिससे किसानों में भारी आक्रोश है।
किसानों ने प्राधिकृत अधिकारी एवं प्रबंधक की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्हें हटाने तथा दूध गंगा का संचालन किसानों को सौंपने की मांग की है। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो संस्था को गंभीर आर्थिक नुकसान हो सकता है।

9 अप्रैल को निरीक्षण के बाद बंद हुई थी दूध गंगा

उल्लेखनीय है कि 9 अप्रैल 2026 को कलेक्टर के निरीक्षण के दौरान दूध गंगा परिसर में गंदगी और अव्यवस्था पाए जाने पर संचालन बंद कर सफाई एवं आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बाद संस्था में मरम्मत और सुधार कार्य कराए गए थे, जिन्हें लेकर अब किसानों ने सवाल उठाए हैं।


क्या बोले प्राधिकृत अधिकारी गणेश जोशी?

किसानों के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए दूध गंगा के प्राधिकृत अधिकारी गणेश जोशी ने कहा कि किसानों की पहली मांग दूध की कीमत बढ़ाने से संबंधित है। उन्होंने बताया कि हाल ही में किसानों को मिलने वाली दूध की दर 42 रुपये से बढ़ाकर 44 रुपये प्रति लीटर की गई है। किसानों द्वारा 50 रुपये प्रति लीटर की मांग रखी गई है, जिस पर आगामी बैठक में चर्चा कर निर्णय लिया जाएगा।
बोनस भुगतान के संबंध में उन्होंने कहा कि संस्था में बोनस का वितरण वार्षिक आमसभा के बाद किया जाता है और इस बार भी आमसभा के पश्चात किसानों को बोनस प्रदान किया जाएगा।
मरम्मत और अन्य कार्यों में अनियमितता के आरोपों को खारिज करते हुए गणेश जोशी ने कहा कि किसानों द्वारा लगाए गए आरोप निराधार हैं। उन्होंने दावा किया कि दूध गंगा में किए गए प्रत्येक खर्च का पूरा लेखा-जोखा उपलब्ध है और सभी कार्य तत्कालीन आवश्यकताओं एवं नियमानुसार कराए गए हैं। उनके अनुसार संस्था में जो भी राशि खर्च की गई, वह परिस्थितियों के अनुरूप आवश्यक कार्यों पर ही खर्च की गई है।

प्रशासन के फैसले पर टिकी निगाहें

“दूध गंगा को लेकर उठे इस विवाद ने संस्था के संचालन और वित्तीय प्रबंधन पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। किसानों का आरोप है कि संस्था में मनमानी और अपारदर्शिता का माहौल बन गया है, जबकि प्राधिकृत अधिकारी इन सभी आरोपों को खारिज कर रहे हैं। अब मामला प्रशासन के दरवाजे तक पहुंच चुका है। किसानों को उम्मीद है कि निष्पक्ष जांच के जरिए दूध गंगा में हुए कार्यों और खर्चों की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी तथा यदि कहीं गड़बड़ी पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी। साथ ही किसानों को यह भी भरोसा है कि प्रशासन के हस्तक्षेप से संस्था में कथित मनमानी पर रोक लगेगी और दूध गंगा का संचालन पारदर्शी एवं किसानों के हितों के अनुरूप किया जाएगा।”

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