तकनीकी सहायक कर्मचारी संघ, जिला बालोद के नेतृत्व में हो रहे इस आंदोलन के जरिए कर्मचारी शासन का ध्यान अपनी समस्याओं की ओर खींचना चाहते हैं। कर्मचारियों का कहना है कि वे लंबे समय से ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, लेकिन उनकी सेवा सुरक्षा और नियमितीकरण से जुड़ी समस्याओं का अब तक समाधान नहीं हो पाया है।

तीन मांगों पर अड़े कर्मचारी, नियमितीकरण सबसे बड़ा मुद्दा
तकनीकी सहायक कर्मचारियों की लड़ाई तीन प्रमुख मांगों को लेकर है। पहली मांग है कि योजना के अंतर्गत कार्यरत सभी तकनीकी सहायकों के लिए नियमित पदों का सृजन किया जाए और उन्हें नियमितीकरण की प्रक्रिया के तहत समायोजित किया जाए।
दूसरी मांग नियमितीकरण की प्रक्रिया पूरी होने तक सेवा शर्तों को लेकर है। संघ चाहता है कि पंचायत विभाग में कार्यरत ग्राम पंचायत सचिवों के समान सेवा शर्तें निर्धारित करते हुए तकनीकी सहायक कर्मचारियों के लिए स्थायीकरण नियमावली तत्काल लागू की जाए।
तीसरी मांग पदनाम में बदलाव की है। कर्मचारी चाहते हैं कि उनके तकनीकी कार्यों और जिम्मेदारियों को देखते हुए तकनीकी सहायक पद का नाम बदलकर ‘कनिष्ठ अभियंता (VB-G RAM G)’ किया जाए।

गांवों में विकास कार्यों की जिम्मेदारी, फिर भी भविष्य को लेकर असमंजस
तकनीकी सहायक कर्मचारी ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों के क्रियान्वयन में अहम भूमिका निभाते हैं। निर्माण कार्यों की तकनीकी निगरानी, प्राक्कलन तैयार करना, कार्यों का मूल्यांकन और गुणवत्ता सुनिश्चित करने जैसे महत्वपूर्ण दायित्व उनके जिम्मे होते हैं। इसके बावजूद नियमितीकरण और स्थायी सेवा व्यवस्था को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने से कर्मचारियों में नाराजगी है।
संघ का कहना है कि वर्षों से विभागीय जिम्मेदारियां निभाने के बावजूद कर्मचारियों को स्थायी सेवा व्यवस्था का लाभ नहीं मिल पाया है। इससे उनके भविष्य और रोजगार की सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। कर्मचारियों की मांग है कि शासन उनके कार्यों और जिम्मेदारियों को देखते हुए सेवा संबंधी समस्याओं का स्थायी समाधान करे।

तीन दिन का आंदोलन, शासन के फैसले पर टिकी निगाहें
13 और 14 अक्टूबर को जिला स्तर पर होने वाले ध्यानाकर्षण कार्यक्रम के बाद 15 अक्टूबर को प्रदेशव्यापी सांकेतिक हड़ताल के जरिए कर्मचारी अपनी एकजुटता दिखाएंगे। आंदोलन के माध्यम से नियमितीकरण, स्थायीकरण नियमावली और पदनाम परिवर्तन की मांगों पर ठोस निर्णय लेने का दबाव बनाया जाएगा।
अब निगाहें शासन-प्रशासन के रुख पर टिकी हैं। कर्मचारियों को उम्मीद है कि उनकी वर्षों से लंबित मांगों पर सकारात्मक पहल होगी और सेवा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों का समाधान निकलेगा। वहीं, यदि मांगों पर निर्णय नहीं होता है, तो कर्मचारियों का असंतोष आगे क्या रुख लेगा, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।













