प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ भले ही अलग-अलग दिखाई देते हों, लेकिन इनका मूल एक ही है। आत्मा आनंद से परिपूर्ण है, फिर भी मनुष्य उस आनंद को अनुभव करने के बजाय दुख भुलाने के लिए शराब और अन्य नशीले पदार्थों का सहारा लेता है। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति सब कुछ पाना चाहता है, लेकिन उसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार नहीं होता। पसीने की एक बूंद ही आगे चलकर मोती बनती है, इसलिए जागरूकता और परिश्रम ही जीवन की वास्तविक पूंजी हैं।
मुनि ने कहा कि धन कमाना गलत नहीं है, लेकिन धन से चिपक जाना मूर्छा है। आज अधिकांश लोगों की सोच केवल धन अर्जित करने और करोड़पति बनने तक सीमित हो गई है। उन्होंने कहा कि साधु बनने से नहीं, बल्कि भीतर जागने से जीवन की समस्याओं का समाधान होता है।

वर्तमान में जीना ही सबसे बड़ा धन
अक्षय मुनि ने कहा कि जीवन के तीन सबसे बड़े धन हैं—वर्तमान में जीना, अकेले में जीना और सहजता से जीना। इसके विपरीत मनुष्य की तीन प्रमुख कमजोरियां स्वार्थ, पूर्वाग्रह और आवेश हैं। उन्होंने कहा कि इंद्रियों को उत्तेजना नहीं, संवेदना देनी चाहिए और गुरु को कभी भी भौतिक दुनिया के पैमानों से नहीं आंकना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अहंकार बढ़ने पर प्रेम घट जाता है और क्रोध रिश्तों को नष्ट कर देता है। भक्ति में रहने से प्रेम का झरना फूटता है और आनंदमय जीवन ही वास्तविक साधना है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे जमीन से जुड़े रहकर आगे बढ़ें, तभी स्थायी सफलता प्राप्त कर सकेंगे।
तपस्या का क्रम लगातार जारी
धर्मसभा में अक्षय मुनि की प्रेरणा से तपस्या का क्रम भी लगातार आगे बढ़ रहा है। रत्ना सोनम श्रीमाल ने 28 उपवास, रितु बाफना ने 27 उपवास और रितेश पारख ने तीन उपवास का संकल्प लिया।
बच्चों की धर्म पाठशाला भी संचालित
समता भवन में प्रत्येक रविवार को बच्चों की धर्म पाठशाला आयोजित की जाती है, जहां उन्हें धर्म, ध्यान और ज्ञान से जुड़ी शिक्षाएं दी जाती हैं, ताकि उनमें बचपन से ही संस्कार और आध्यात्मिक मूल्यों का विकास हो सके।













