
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, वृद्ध महिला लंबे समय से अस्वस्थ अवस्था में बस स्टैंड परिसर में भटक रही थी। हाल के दिनों में महिला ने अपने वस्त्र तक त्याग दिए थे और निर्वस्त्र अवस्था में सार्वजनिक स्थान पर घूम रही थी, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि आम नागरिकों से लेकर जिम्मेदार तंत्र तक—किसी ने समय रहते उसकी सुध नहीं ली।

मामले को गंभीरता से लेते हुए मौके पर मौजूद पत्रकारों ने पहले स्थानीय तहसीलदार आशुतोष शर्मा को सूचना दी। तहसीलदार तुरंत बस स्टैंड पहुंचे और महिला की हालत देखकर जिला अस्पताल के सिविल सर्जन को फोन कर एंबुलेंस की व्यवस्था करने को कहा। लेकिन सिविल सर्जन ने नियमों का हवाला देते हुए 108 पर कॉल करने की सलाह देकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।

स्थिति यहीं नहीं रुकी। जब नगर पालिका से संपर्क किया गया तो एम्बुलेंस की जगह कचरा वाहन भेज दिया गया, जिसे देखकर मौके पर मौजूद लोग और पत्रकार आक्रोशित हो उठे। यह दृश्य प्रशासनिक संवेदनहीनता का प्रतीक बन गया।
अंततः पत्रकारों ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव भारती कुलदीप को पूरे मामले से अवगत कराया। सूचना मिलते ही वे स्वयं मौके पर पहुंचीं और जिला अस्पताल से सीधे संपर्क किया। उनके फोन करते ही महज 10 मिनट के भीतर एंबुलेंस मौके पर पहुंच गई, जिससे यह सवाल और गहरा हो गया कि क्या स्वास्थ्य सेवाएं केवल “प्रभाव” के बाद ही सक्रिय होती हैं?
विक्षिप्त महिला को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। सचिव भारती कुलदीप ने बताया कि महिला का संपूर्ण चिकित्सकीय परीक्षण कराया जाएगा और इलाज का प्रतिवेदन तैयार कर उसे सेंदरी, बिलासपुर भेजा जाएगा, जहां उसका समुचित उपचार सुनिश्चित किया जाएगा।

यह घटना केवल एक विक्षिप्त महिला की पीड़ा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक उदासीनता और स्वास्थ्य विभाग की जमीनी हकीकत पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
जब कोई बेसहारा महिला कई दिनों तक निर्वस्त्र अवस्था में सार्वजनिक स्थल पर भटकती रही, तब समाज और व्यवस्था दोनों मौन क्यों रहे?
बालोद की यह घटना न केवल स्वास्थ्य तंत्र की लाचारी को उजागर करती है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि क्या मानवीय संवेदना अब नियमों और औपचारिकताओं के बोझ तले दबती जा रही है?




















