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बसंत पंचमी पर क्यों गाड़ा जाता है ‘अंडा पेड़’? इसी रस्म से कैसे शुरू होती है होलिका की तैयारी… जानिए पढ़ें प्रदेश रुचि की ये खास रिपोर्ट

रिपोर्टिंग (नरेश श्रीवास्तव)

लेख – संतोष साहू 

बालोद। माघ मास की शुक्ल पंचमी को मनाए जाने वाले बसंत पंचमी पर्व ने शुक्रवार को बालोद जिले में एक बार फिर लोकसंस्कृति और परंपराओं को जीवंत कर दिया। जिले के शहरी और ग्रामीण अंचलों में इस पर्व को न केवल श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया, बल्कि विलुप्त होती लोक परंपराओं को भी सहेजने का सुंदर प्रयास देखने को मिला।

बसंत पंचमी के अवसर पर नगर सहित ग्रामीण अंचलों में होलिका दहन की पारंपरिक शुरुआत ‘अंडा पेड़’ गाड़ने की रस्म के साथ की गई। जिला मुख्यालय के पुराना बस स्टैंड, बुधवारी बाजार एवं विभिन्न वार्डों में लोगों ने सामूहिक रूप से अंडा पेड़ गाड़कर विधिवत पूजा-अर्चना की और परंपरा का निर्वहन किया। इसके साथ ही होलिका दहन के लिए लकड़ियां एकत्रित करने का कार्य भी प्रारंभ हो गया, जिन्हें अंडा पेड़ के समक्ष रखा गया।

ग्रामीण अंचलों में भी यही दृश्य देखने को मिला, जहां गांव-गांव में बसंत पंचमी पर अंडा पेड़ गाड़कर आने वाले फाल्गुन और होलिका पर्व का प्रतीकात्मक आगाज किया गया। यह परंपरा न केवल सामाजिक सहभागिता का प्रतीक है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक धरोहर का सशक्त उदाहरण भी है।


विद्या और प्रकृति का उत्सव
बसंत पंचमी के दिन जिले भर के घरों, स्कूलों और महाविद्यालयों में विद्या और बुद्धि की देवी मां सरस्वती की पूजा-अर्चना श्रद्धापूर्वक की गई। शैक्षणिक संस्थानों में विशेष आयोजन हुए, जहां विद्यार्थियों ने ज्ञान, विवेक और सृजनशीलता की कामना की। महिलाओं ने पीले वस्त्र धारण कर पूजा की, वहीं वातावरण में बसंत के आगमन की उल्लासपूर्ण छटा दिखाई दी।
बसंत—ऋतुओं का राजा, प्रकृति का उत्सव
छह ऋतुओं में बसंत को विशेष स्थान प्राप्त है। यह ऋतु नवसृजन, उल्लास और सौंदर्य का प्रतीक मानी जाती है। पेड़ों से पुराने पत्तों का झड़ना और नई कोपलों का आना मानो प्रकृति के नवजीवन का संदेश देता है। यही कारण है कि बसंत पंचमी को केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है।
लोककथा और आस्था का संगम
प्रचलित मान्यता के अनुसार, सृष्टि की रचना के बाद जब चारों ओर मौन और नीरवता छाई थी, तब ब्रह्माजी ने वाणी और ज्ञान के संचार हेतु देवी सरस्वती को प्रकट किया। तभी से बसंत पंचमी को वाणी, विद्या और विवेक की आराधना का पर्व माना गया। इसी आस्था के साथ जिले के सभी शैक्षणिक संस्थानों में यह पर्व श्रद्धा और सांस्कृतिक चेतना के साथ मनाया गया।

संस्कृति को सहेजने की पहल
बसंत पंचमी पर अंडा पेड़ गाड़ने जैसी परंपराएं आज के आधुनिक दौर में भले ही दुर्लभ होती जा रही हों, लेकिन बालोद जिले में इन्हें जीवंत रखकर समाज ने यह संदेश दिया कि संस्कृति तभी जीवित रहती है, जब उसे उत्सवों के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
बसंत पंचमी का यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि लोकसंस्कृति, प्रकृति और सामूहिक सहभागिता का सुंदर संगम भी साबित हुआ।

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