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रास्ते खुद बयां कर रहे हैं बदहाली की दास्तान जिला मुख्यालय से 16 किमी दूर गांव, लेकिन पहुंचने के लिए तय करनी पड़ती है 37 किमी की पीड़ा भरी दूरी

बालोद।आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी बालोद जिले का वनांचल ग्राम मंगचुवा विकास की मुख्यधारा से कटकर मानो अबूझमाड़ जैसी ज़िंदगी जीने को मजबूर है। जिला मुख्यालय से महज 16 किलोमीटर की सीधी दूरी पर बसे इस गांव के ग्रामीणों को प्रशासनिक काम या इलाज के लिए हितेकसा–कान्हरपुरी–गुरूर होकर करीब 37 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है।
ग्रामीणों की पीड़ा यहीं खत्म नहीं होती। पानी, बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव आज भी उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को कठिन बनाए हुए है। करकाभाठ के पास मुख्य मार्ग से गांव की दूरी सिर्फ साढ़े तीन किलोमीटर है, लेकिन यही छोटा-सा रास्ता वर्षों से जर्जर हालत में पड़ा है और शासन की सुध का इंतज़ार कर रहा है। यदि यह मार्ग बन जाए, तो मंगचुवा सीधे जिला मुख्यालय से जुड़ सकता है और ग्रामीणों को राहत मिल सकती है।


ग्रामीणों ने बताया कि करकाभाठ–मंगचुवा मार्ग का निर्माण और रखरखाव जमींदारी काल में उनके पुरखों द्वारा किया गया था। जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद यह मार्ग उपेक्षा का शिकार हो गया। ग्राम पटेल तखत भूसाखरे ने कहा कि आज़ादी के बाद अब तक किसी सरकार ने इस सड़क पर ध्यान नहीं दिया। चुनाव के समय नेता वोट मांगने आते हैं, लेकिन समस्याओं का समाधान नहीं होता।
ग्राम पंचायत के सरपंच भूपेश हिरवानी ने बताया कि मंगचुवा उनका आश्रित गांव है। उनके पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री आवास, सीमेंटीकरण और मनरेगा के तहत काम हुए, लेकिन सड़क की मांग पूरी नहीं हो सकी। उन्होंने कहा कि इस कार्यकाल में करकाभाठ–मंगचुवा सड़क उनकी पहली प्राथमिकता है, जिससे गांव सीधे जिला मुख्यालय से जुड़ सके।


मितानिन नीता भूसाखरे का कहना है कि सड़क उनकी सबसे बड़ी बुनियादी जरूरत है। बालोद जैसे विकासशील जिले में रहते हुए भी बीहड़ जैसी ज़िंदगी जीना दुर्भाग्यपूर्ण है। वयोवृद्ध कृष्ण कुमार भूसाखरे ने कहा कि पूरी उम्र विकास की राह ताकते बीत गई—अब तो बस यही चाह है कि बच्चों को पक्की सड़क पर चलते देख सकें।
युवा कृषक जागेश्वर सिंह सोरी ने सवाल उठाया कि अगर सड़क, पानी और बिजली के लिए भी प्रार्थना करनी पड़े, तो यह लोकतंत्र की व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है। वहीं बुजुर्ग दुलार सिंह सोरी ने कहा कि नई सड़क बच्चों की पढ़ाई और भविष्य दोनों आसान बना देगी। युवा महेंद्र कोवाची ने चेताया कि अगर शासन-प्रशासन ने नहीं सुना, तो ग्रामीण सड़क के लिए संघर्ष को मजबूर होंगे।


गांव के दो वर्ष पूर्व नागरिक बने नाड़ी विशेषज्ञ, समाजसेवी डॉ. पुरुषोत्तम सिंह राजपूत ने आश्चर्य जताते हुए कहा कि जिला मुख्यालय के इतने करीब होकर भी आदिवासी बहुल गांव को सड़क जैसी मूल सुविधा के लिए तरसना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि 37 किमी की मजबूरी भरी यात्रा ग्रामीणों के दर्द को बयां करती है।

ग्रामीणों का कहना है कि जहां कुछ आयोजनों पर 12–15 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं, वहीं इस सड़क की लागत 3–4 करोड़ रुपये से अधिक नहीं होगी—जो उनका मौलिक अधिकार है।


जनदर्शन में गुहार
मामले को लेकर मंगचुवा के ग्रामीण बालोद जनदर्शन पहुंचे और अपनी समस्याओं से अवगत कराते हुए आवेदन सौंपा। ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से शीघ्र निर्णय लेकर सड़क निर्माण की मांग की, ताकि वर्षों से झेली जा रही इस पीड़ा का अंत हो

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