
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जगदीश देशमुख (प्रदेश अध्यक्ष, तुलसी मानस प्रतिष्ठान) रहे, जबकि अध्यक्षता जिला अध्यक्ष भारत बुलंदी ने की। मंच संचालन की सधी हुई कमान जिला संयोजक डॉ. अशोक आकाश ने संभाली।
मुख्य अतिथि जगदीश देशमुख ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में संगठनात्मक एकता पर जोर देते हुए कहा कि साहित्यकार समाज का दर्पण ही नहीं, उसका मार्गदर्शक भी होता है। जब रचनाकार एक सूत्र में बंधते हैं, तो लेखनी का प्रभाव दूर तक जाता है। उन्होंने राष्ट्रीय कवि संगम के प्रयासों की सराहना करते हुए जिले के सभी रचनाकारों से इससे जुड़कर अपनी पहचान मजबूत करने और साहित्यिक मूल्यों के संरक्षण-संवर्धन में सहभागी बनने का आह्वान किया।
संगोष्ठी में जिले के वरिष्ठ रचनाकार शिव कुमार अंगारे, पूरन सिंह माली, पुनूराम गुरूपंच, थानूराम सिन्हा, ताम्रध्वज उमरे, भारत सिन्हा, कामता प्रसाद देसलहरे, गायत्री साहू शिवांगी, वीरेंद्र अजनबी, योगेश छत्तीसगढ़िया और कन्हैयालाल बारले की गरिमामयी उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान शंकर की पूजा-अर्चना से हुआ। वार्षिक कार्ययोजना प्रस्तुत करते हुए डॉ. अशोक आकाश ने कहा कि निरंतर सृजन ही साहित्यकार को स्थापित करता है। सचिव डॉ. एस.एल. गंधर्व ने संगठन को सक्रिय और जीवंत रखने का संकल्प दिलाया। अध्यक्षीय उद्बोधन में भारत बुलंदी ने वर्षभर गीत, कविता और कहानी की विविध विधाओं में सतत सृजन का भरोसा दिलाया।
संगठनात्मक चर्चा में लोक पर्वों और महापुरुषों की जयंती पर आयोजन, सभी साहित्यिक समितियों को साथ लेकर चलने और वार्षिक सदस्यता शुल्क निर्धारण जैसे सुझावों पर सहमति बनी। काव्य सत्र में डॉ. एस.एल. गंधर्व की ‘सुन भोला कहत हव तोला’, वीरेंद्र अजनबी की ‘कइसे जीवन धन्य होही’, गायत्री शिवांगी की हेलमेट सुरक्षा पर रचना, योगेश छत्तीसगढ़िया की राष्ट्र-विकास पर कविता और ताम्रध्वज उमरे की ‘मां’ पर भावपूर्ण प्रस्तुति ने श्रोताओं को भावविभोर किया। भारत सिन्हा ने यात्रा-वृत्तांत और कन्हैयालाल बारले ने व्यंग्य के माध्यम से विचार रखे।
आभार प्रदर्शन के साथ जिला अध्यक्ष भारत बुलंदी ने कार्यक्रम का समापन किया—और बालोद की साहित्यिक शाम यादगार बन गई।




















