
कैसे शुरू हुआ विवाद?
सोनादि भास्कर, जिनके पति का निधन 5 साल पहले हो चुका है, बाजार में सब्जी बेचकर तीन बच्चों का पालन-पोषण करती हैं। उनका बेटा डीएवी स्कूल में पढ़ रहा था। हाल ही में उसे एक विषय में सप्लीमेंट्री मिली। आर्थिक तंगी के बावजूद माँ ने हाथ जोड़कर प्रिंसिपल से बेटे को दोबारा पढ़ाई का अवसर देने की गुहार लगाई। कई शिक्षकों ने भी बच्चे के पक्ष में समर्थन किया।
“औकात नहीं है इस स्कूल में पढ़ने की”
महिला का आरोप है कि प्रिंसिपल ने बेटे के सामने ही उसे अपमानित किया। उन्होंने कथित तौर पर कहा –
“तुम्हारी औकात नहीं है इस स्कूल में पढ़ने की।”
यही नहीं, महिला को अपमानित करते हुए कथित रूप से ‘डायन’ कह दिया और स्थानांतरण प्रमाणपत्र (TC) भी उनके ऊपर फेंक दिया।
बच्चे पर मानसिक असर
इस अपमानजनक घटना के बाद बच्चा गहरे सदमे में चला गया है। माँ का कहना है कि बेटे ने अपनी आँखों से यह सब देखा और उसका आत्मविश्वास पूरी तरह टूट गया। बच्चा अब किसी भी स्कूल में एडमिशन लेने से इंकार कर रहा है।
शिक्षकों ने भी खोला मोर्चा
प्रिंसिपल पर यह पहला आरोप नहीं है। हाल ही में स्कूल शिक्षकों ने भी उनके खिलाफ मोर्चा खोला था और प्रबंधन से उन्हें हटाने की माँग की थी। शिक्षकों का आरोप है कि वह स्टाफ के साथ दुर्व्यवहार करती हैं और मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद जिम्मेदार पद पर बनी हुई हैं। बढ़ते विवाद के बाद एनएमडीसी प्रबंधन को बीच में आना पड़ा और शिक्षकों को आश्वासन देकर काम पर लौटाया गया।

प्रिंसिपल का बयान – “मेरी डिप्रेशन की दवा चल रही है”
जब मीडिया ने प्रिंसिपल चेतना शर्मा से बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने खुद माना कि वे मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं और डिप्रेशन की दवा ले रही हैं। उन्होंने कहा कि वे इस विषय पर बात नहीं कर सकतीं।
प्रशासन से सवाल
अब बड़ा सवाल यह है कि अगर प्रिंसिपल मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं तो उन्हें इतने संवेदनशील और जिम्मेदार पद पर क्यों बनाए रखा गया है?
क्या इस क्षेत्र के बच्चों और अभिभावकों की भावनाएँ और आत्मसम्मान की कोई कीमत नहीं?

कानूनी पहलू
बाल अधिकार कानून के मुताबिक किसी भी बच्चे को उसकी जाति, धर्म, वर्ग या आर्थिक स्थिति के आधार पर अपमानित करना पूरी तरह अवैध है। बाल अधिकार कार्यकर्ता इस मामले को बाल संरक्षण आयोग और मानवाधिकार आयोग तक ले जाने की तैयारी कर रहे हैं।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र की संवेदनशीलता
गौरतलब है कि यह घटना उस दंतेवाड़ा जिले की है, जो नक्सल प्रभावित इलाकों में गिना जाता है। यहाँ शिक्षा व्यवस्था पहले ही चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में यदि स्कूलों में बच्चों और उनके अभिभावकों के साथ इस तरह का अमानवीय व्यवहार होगा, तो यह शिक्षा के प्रति विश्वास को और कमजोर करेगा।




















