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विश्व रेबीज दिवस पर डॉ. वीरेन्द्र गंजीर का संदेश: जानलेवा बीमारी से बचाव आसान है

सावधानी ही सबसे बड़ी सुरक्षा

डॉ. वीरेन्द्र गंजीर, पूर्व महामारी विशेषज्ञ, बालोद

हर साल 28 सितंबर को विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य है लोगों को इस घातक बीमारी के प्रति जागरूक करना। रेबीज एक ऐसी बीमारी है, जो आज भी इंसान और जानवर दोनों के लिए जानलेवा बनी हुई है। लेकिन अच्छी बात यह है कि थोड़ी सी सावधानी और समय पर इलाज से इससे बचाव पूरी तरह संभव है।

रेबीज का संक्रमण ज्यादातर कुत्तों के काटने या खरोंचने से होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार 96 प्रतिशत मामले कुत्तों से ही जुड़े होते हैं। हालांकि बिल्ली, बंदर और अन्य जंगली जानवर भी इसके वाहक बन सकते हैं। इस पर डॉ. वीरेन्द्र गंजीर बताते हैं कि सामान्यतः स्वस्थ पालतू जानवर बेवजह किसी को नहीं काटते, लेकिन यदि कोई आवारा जानवर अचानक काट ले तो इसे हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है।

सबसे जरूरी है कि काटने या खरोंचने के तुरंत बाद घाव को साबुन और बहते पानी से धोया जाए। घाव को खुला छोड़ना चाहिए, उस पर टांके या बैंडेज लगाने की गलती नहीं करनी चाहिए। इसके बाद बिना देरी चिकित्सक से मिलकर एंटी-रेबीज टीके लगवाना ही सुरक्षित उपाय है। इस बारे में डॉ. गंजीर का कहना है कि “घाव को जितनी जल्दी धोकर उपचार शुरू किया जाएगा, उतना ही संक्रमण का खतरा कम होगा।

इलाज की प्रक्रिया घाव की गंभीरता पर निर्भर करती है। डॉ. वीरेन्द्र गंजीर समझाते हैं कि यदि केवल छूने या लार लगने की स्थिति है तो किसी टीके की आवश्यकता नहीं होती। हल्के खरोंच या मामूली खून निकलने पर त्वचा के नीचे चार या मांसपेशियों में पांच डोज टीके लगाए जाते हैं। वहीं गहरे घाव में टीकों के साथ-साथ इम्यूनोग्लोबुलिन का भी इस्तेमाल करना पड़ता है। जिन लोगों ने पहले से एंटी-रेबीज टीके लगवाए हैं, उन्हें दोबारा काटने की स्थिति में केवल पहले और तीसरे दिन का डोज लेना पर्याप्त होता है।

रेबीज की भयावहता इसी में है कि यह संक्रमण यदि शरीर में पहुँच गया और समय पर टीका नहीं लगा तो कुछ समय बाद इसके लक्षण प्रकट होते हैं—जैसे पानी से डरना, हवा और रोशनी से घबराना, सांस लेने में तकलीफ और झटके आना। डॉ. गंजीर चेतावनी देते हैं कि यह लक्षण 30 दिन से लेकर कई साल बाद भी दिखाई दे सकते हैं और एक बार दिखने के बाद इसका कोई इलाज संभव नहीं है। यही वजह है कि रेबीज को लेकर “सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव” कहा जाता है।

बचाव के लिए जरूरी है कि पालतू जानवरों का नियमित टीकाकरण किया जाए और उन्हें आवारा जानवरों से दूर रखा जाए। घर और आसपास गंदगी या बचा हुआ खाना न फेंकें ताकि आवारा कुत्ते आसपास न आएं। बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि वे किसी अनजान जानवर को न छेड़ें और न ही उसके नजदीक जाएं। डॉ. वीरेन्द्र गंजीर बताते हैं कि स्थानीय निकाय और पंचायत स्तर पर आवारा कुत्तों के टीकाकरण अभियान को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि संक्रमण की संभावनाएं कम हो सकें।

संक्रमित जानवरों की पहचान भी जरूरी है। यदि किसी जानवर के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखे, उसकी भौंकने की आवाज बदल जाए, वह बिना वजह काटने लगे, पानी से डरने लगे या मुंह से लगातार लार गिरे, तो यह रेबीज का संकेत हो सकता है। डॉ. गंजीर बताते हैं कि आमतौर पर ऐसे जानवर 10 से 15 दिनों में मर जाते हैं।

आज रेबीज से बचाव के लिए उपलब्ध टीके पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सुरक्षित और आसान हैं। कभी कुत्तों के काटने पर 14 इंजेक्शन लगते थे, जिससे लोग डरकर झाड़फूंक या जड़ी-बूटियों का सहारा लेते थे और जान गँवा बैठते थे। लेकिन अब सिर्फ 4 या 5 डोज पर्याप्त हैं। डॉ. वीरेन्द्र गंजीर के अनुसार शोध में पाया गया है कि त्वचा में लगाए जाने वाले टीके ज्यादा प्रभावी हैं और आने वाले समय में केवल 3 डोज से ही बचाव संभव हो सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सभी टीके शासकीय अस्पतालों में निःशुल्क उपलब्ध हैं और छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा गंभीर मरीजों के लिए भी पूरी तरह सुरक्षित हैं।

रेबीज केवल एक बीमारी नहीं बल्कि जीवन और मृत्यु का प्रश्न है। इसीलिए जरूरी है कि हम और हमारा समाज इसके प्रति जागरूक बने। डॉ. वीरेन्द्र गंजीर का कहना है—“जानवर हमारे पर्यावरण का हिस्सा हैं। हमें उन्हें छेड़ना नहीं चाहिए। लेकिन यदि कभी काटने की घटना हो जाए तो समय पर टीका ही जीवन बचाने का सबसे बड़ा उपाय है।”

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