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100 के हुए राजकपूर..आग’ से ‘आत्मकथा’ तक: राज कपूर को दी गई शब्दों की श्रद्धांजलि

राज कपूर शताब्दी समारोह की शुरुआत: ‘शोमैन’ नहीं, भारत की भावनात्मक आत्मकथा

नई दिल्ली, भारतीय सिनेमा के युगद्रष्टा राज कपूर के जन्म के सौ वर्ष पूरे होने पर देशभर में शुरू हुए वर्षव्यापी शताब्दी समारोह की भव्य शुरुआत हुई। दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुए कार्यक्रम ‘शब्दांजलि: राज कपूर – द आइडिया ऑफ शोमैनशिप’ के माध्यम से उन्हें नमन किया गया। आयोजन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) और रेस्पेक्ट इंडिया संस्था द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।

कार्यक्रम में प्रमुख वक्ता के तौर पर आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने राज कपूर को सिर्फ शोमैन नहीं, बल्कि एक नैतिक दर्पण करार दिया। उन्होंने कहा, “राज कपूर ने सिर्फ सिनेमा नहीं रचा, उन्होंने एक राष्ट्र के स्वप्न, संघर्ष और संवेदना को चित्रित किया। ‘बॉबी’ और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी फिल्मों ने युवा पीढ़ी में जोश भर दिया।”

कार्यक्रम की अध्यक्षता सिक्किम के पूर्व राज्यपाल  बी.पी. सिंह ने की जबकि सांसद श्री मनोज तिवारी मुख्य अतिथि रहे। संस्कृति मंत्रालय की अपर सचिव श्रीमती निरुपमा कोटरू, वरिष्ठ अभिनेता मुकेश त्यागी, पद्मश्री डॉ. यश गुलाटी सहित कई गणमान्य अतिथि भी मौजूद रहे।

 कोटरू ने अपने भाषण में बताया कि राज कपूर की फिल्मों की सामाजिक संवेदना कितनी गहरी थी। उन्होंने ‘बूट पॉलिश’, ‘जागते रहो’ और ‘बावरे’ जैसी फिल्मों का हवाला देते हुए कहा, “उनकी संवेदनशीलता उन तबकों के लिए थी, जिन्हें समाज ने भुला दिया था।” उन्होंने एक किस्सा साझा करते हुए बताया कि अफ्रीका में एक मरीज ने सिर्फ इसलिए डॉक्टर पर भरोसा जताया क्योंकि वह “राज कपूर के भारत” से था।

बी.पी. सिंह ने कपूर को “लोकप्रिय सिनेमा के माध्यम से नैतिकता के प्रचारक” के रूप में सराहा, जबकि श्री तिवारी ने उन्हें “एक पीढ़ी की सिनेमाई अंतरात्मा” कहा।
रेस्पेक्ट इंडिया के अध्यक्ष डॉ. निर्मल गहलोत ने अपने स्वागत भाषण में कहा, “यह शताब्दी समारोह एक ऐसे कलाकार के प्रति कृतज्ञता का राष्ट्रीय क्षण है, जिसने भारत को परदे पर आत्मा दी।”

कार्यक्रम के दौरान यह घोषणा की गई कि राज कपूर शताब्दी वर्ष भर चलेगा, जिसमें व्याख्यान, सांस्कृतिक कार्यक्रम और प्रदर्शनियों की श्रृंखला भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की जाएगी।

डॉ. जोशी ने अंत में कहा, “राज कपूर केवल एक फिल्म निर्माता नहीं थे, वे सेल्युलाइड पर लिखी गई भारत की भावनात्मक आत्मकथा थे।”

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