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बालोद में बेलगाम अवैध रेत खनन पर जिला पंचायत सदस्य ने उठाई आवाज, कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन

बालोद, गुण्डरदेही ब्लॉक के ग्राम पंचायत गोडेला के आश्रित ग्राम खुर्सीपार में वर्षों से चली आ रही खारे पानी की समस्या अब गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुकी है। सोमवार को इस मुद्दे को लेकर जिला पंचायत सदस्य गुलशन चंद्राकर ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपते हुए समाधान की मांग की। उन्होंने बताया कि ग्राम खुर्सीपार का जल शुरू से ही खारा रहा है, जिससे ग्रामीणों को पीलिया, उल्टी-दस्त, पेट दर्द एवं चक्कर आने जैसी स्वास्थ्य समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं।

इस समय करीब 50 ग्रामीण इन बीमारियों से ग्रसित हैं। स्वास्थ्य विभाग को सूचित करने के बाद शिविर तो लगाया गया, लेकिन यह समाधान नहीं, सिर्फ तात्कालिक राहत है। वर्ष 2023 में डायरिया फैलने से एक ग्रामीण की मृत्यु भी हो चुकी है।

गुलशन चंद्राकर ने प्रशासन से मांग की है कि ग्राम खुर्सीपार की जल टंकी को समीपस्थ ग्राम खुरसुनी स्थित मल्टी विलेज ओवरहेड टैंक से जोड़ा जाए, जिससे स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति संभव हो सके।

अवैध रेत और मुरूम खनन पर जताई चिंता
ज्ञापन में दूसरा अहम मुद्दा जिले में तेजी से फैल रहे अवैध रेत और मुरूम उत्खनन का था। जिला पंचायत सदस्य ने बताया कि बालोद जिले के कई गांवों से ग्रामीणों द्वारा अवैध खनन की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। परंतु खनिज विभाग की उदासीनता के कारण अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

हाल ही में ग्राम मरकाटोला में एक पत्रकार कृष्णा गंजीर पर अवैध रेत भंडारण की रिपोर्टिंग के दौरान हमला किया गया, जिसे उन्होंने निंदनीय बताया और कहा कि यह लोकतंत्र एवं पत्रकारिता पर सीधा हमला है।

उन्होंने शासन-प्रशासन से मांग की कि जिले में हो रहे अवैध खनन पर तत्काल रोक लगाई जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। ज्ञापन सौंपने के दौरान युवा नेता आदित्य दुबे भी उपस्थित रहे।

अवैध रेत खनन पर कब जागेगा खनिज विभाग?

बालोद जिले में अवैध रेत खनन की समस्या किसी रहस्य की तरह नहीं, बल्कि एक खुला खेल बन चुका है। शिकायतों की भरमार है, लेकिन कार्रवाई सिर्फ खानापूर्ति बनकर रह गई है। खनिज विभाग पर सवाल इसलिए भी उठते हैं क्योंकि कार्रवाई होने के बाद भी अवैध खनन का खेल रुकता नहीं, बल्कि और खुलेआम होने लगता है।

ऐसा ही ताजा उदाहरण जिले के भैसमुड़ी रेत खदान का है। जहां पिछले सप्ताह प्रशासन द्वारा एक दिन की कार्रवाई की गई, मशीनें हटाई गईं, चालान काटे गए, लेकिन महज 24 घंटे के भीतर वही रेत खनन फिर से शुरू हो गया। अब सवाल उठता है कि क्या यह विभाग की लापरवाही है या मिलीभगत?

ग्रामीणों का कहना है कि वे लगातार शिकायत कर रहे हैं, लेकिन खनिज विभाग की टीम जैसे एक्शन के बाद नींद में चली जाती है। स्थिति इतनी गंभीर है कि इसे नजरअंदाज करना अब जनजीवन और पर्यावरण दोनों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।

खनन से न सिर्फ नदियों की सेहत बिगड़ रही है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कें भी भारी वाहनों की आवाजाही से जर्जर हो चुकी हैं। प्रशासन की निष्क्रियता ने इस अवैध व्यापार को और भी निर्भीक बना दिया है।

अब देखने वाली बात ये है कि खनिज विभाग कब तक इस “गहरी नींद” से जागता है और कब इन खदानों पर स्थायी अंकुश लगता है।

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