शनिवार देर शाम NH 930 बालोद बस स्टैंड के पास बहते पानी के बीच एजॉक्स मशीन से नाली की ढलाई का कार्य किया जा रहा था। प्रदेशरुचि की टीम मौके पर पहुंची तो निर्माण कार्य कैमरे में रिकॉर्ड किया जाने लगा। मीडिया की मौजूदगी का एहसास होते ही एजॉक्स मशीन तत्काल बंद कर दी गई और उसे बस स्टैंड परिसर में खड़ा कर दिया गया। इसके बाद निर्माण कार्य भी धीमा पड़ गया। इस घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि यदि कार्य पूरी तरह तकनीकी मानकों के अनुरूप था तो उसे अचानक रोकने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
मामले पर जब इस संबंध में राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग के एसडीओ से बात की तो उन्होंने बताया कि निर्माण कार्य में ओपीसी 53 ग्रेड सीमेंट का उपयोग किया जा रहा है तथा मिश्रण में लगभग 10 प्रतिशत अतिरिक्त सीमेंट मिलाया जा रहा है। उनका कहना था कि बहते पानी में ढलाई से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। इतना ही नहीं, उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि “जब समुद्र के भीतर बड़े-बड़े पुल बन सकते हैं तो यहां इतने पानी से क्या फर्क पड़ेगा।”

हालांकि, निर्माण तकनीक से जुड़े जानकार इस दावे से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र या नदी में बनने वाले पुल सामान्य ढलाई से नहीं बनाए जाते। ऐसे कार्यों में पानी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए कॉफरडैम, डी-वॉटरिंग, ट्रेमी पाइप, एंटी-वॉशआउट एडमिक्सचर जैसी विशेष तकनीकों का उपयोग किया जाता है। केवल अतिरिक्त सीमेंट मिला देने से बहते पानी में सीमेंट पेस्ट के बह जाने (वॉशआउट) की समस्या समाप्त नहीं होती। यदि पानी का बहाव नियंत्रित न हो तो कंक्रीट की मजबूती, घनत्व और टिकाऊपन प्रभावित हो सकता है।
मौके पर निरीक्षण के दौरान एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। ढलाई के समय न तो कोई विभागीय इंजीनियर गुणवत्ता की निगरानी करता दिखाई दिया और न ही सीमेंट, रेत एवं गिट्टी के अनुपात की जांच की कोई व्यवस्था नजर आई। स्थानीय लोगों का कहना है कि पूरे निर्माण कार्य में केवल 20 एमएम गिट्टी का उपयोग किया जा रहा है। हालांकि, यह तकनीकी रूप से सही है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय स्वीकृत ड्राइंग, मिक्स डिजाइन और विभागीय परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर ही किया जा सकता है।
निर्माण स्थल की तस्वीरें यह भी दर्शाती हैं कि नाली के भीतर लगातार पानी मौजूद था और उसी के बीच कंक्रीटिंग की तैयारी चल रही थी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या निर्माण एजेंसी ने पानी के बहाव को रोकने अथवा नियंत्रित करने के लिए कोई मानक व्यवस्था की थी? यदि की थी तो वह मौके पर क्यों दिखाई नहीं दी?
विशेषज्ञों का मानना है कि जल संपर्क वाले निर्माण कार्यों में परियोजना की आवश्यकता के अनुसार पीएससी (Portland Slag Cement) या पीपीसी (Portland Pozzolana Cement) का उपयोग भी किया जाता है। इसके साथ ही गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए नियमित क्यूब टेस्ट, स्लंप टेस्ट, मिक्स डिजाइन का पालन और साइट पर इंजीनियर की निगरानी अनिवार्य मानी जाती है।

अब स्थानीय नागरिक पूरे मामले की स्वतंत्र तकनीकी जांच की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि निर्माण पूरी तरह मानकों के अनुरूप किया जा रहा है तो विभाग को मिक्स डिजाइन, क्यूब टेस्ट रिपोर्ट, गुणवत्ता नियंत्रण रजिस्टर, साइट निरीक्षण रिपोर्ट और उपयोग किए गए एडमिक्सचर संबंधी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बहते पानी के बीच रात में की गई यह ढलाई वास्तव में तकनीकी मानकों के अनुरूप थी, या फिर गुणवत्ता से समझौता कर सरकारी राशि से निर्माण कार्य पूरा किया जा रहा है? अब निगाहें राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग पर हैं कि वह इन सवालों का जवाब जांच के माध्यम से देता है या नहीं।




















