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जब जंगल किताब बन जाए: कोरिया के सीईओ डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी की पहली साहित्यिक कृति ‘यक्षिणी’ चर्चा में

बालोद/कोरिया। प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच साहित्य सृजन का ऐसा उदाहरण कम ही देखने को मिलता है, जब कोई अधिकारी फाइलों और बैठकों के बीच समय निकालकर वर्षों तक एक उपन्यास रचता रहे। कोरिया जिले के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ जिला पंचायत) डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी ने ऐसा ही किया है। लगभग पांच वर्षों की सतत साधना के बाद उनका पहला उपन्यास ‘यक्षिणी : मैकल की अनुगूँज’ पाठकों के सामने आया है।

 


डॉ. चतुर्वेदी प्रशासनिक सेवा में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। वे डीएसपी, डिप्टी कलेक्टर, एसडीएम और नगर निगम आयुक्त जैसे दायित्व निभा चुके हैं। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में भी वे बतौर डिप्टी कलेक्टर अपनी सेवाएं दे चुके हैं। वर्तमान में वे कोरिया जिले में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के रूप में पदस्थ हैं।
साहित्य से पुराना नाता
डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी का साहित्य के प्रति अनुराग पारिवारिक पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है। हिंदी और संस्कृत भाषा की समृद्ध शब्द-संपदा उन्हें विरासत में मिली है। उनके लेख समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं और वे कई साहित्यिक मंचों पर वक्ता एवं साहित्यकार के रूप में भी अपनी पहचान बना चुके हैं। हालांकि एक लेखक के रूप में यह उनकी पहली प्रकाशित पुस्तक है।


मैकल के रहस्यमयी जंगलों की कथा
‘यक्षिणी : मैकल की अनुगूँज’ अपने भीतर मैकल अंचल के रहस्य, लोककथाएं, आध्यात्मिकता और प्रकृति का अनूठा संसार समेटे हुए है। कथा उन घने वनों में प्रवेश कराती है, जहां दोपहर में भी अंधेरा पसरा रहता है और जहां पेड़ों की जड़ों में सदियों पुरानी कहानियां दबी हुई प्रतीत होती हैं।
उपन्यास में एक रहस्यमयी तालाब का उल्लेख है, जो हर किसी को दिखाई नहीं देता। लोकमान्यताओं के अनुसार लालच लेकर पहुंचने वाला वहां से खाली हाथ लौटता है, जबकि श्रद्धा और विस्मय के साथ आने वालों को उसकी गहराइयों में एक स्वर्णिम आभा दिखाई देती है। पूर्णिमा की रातों में वहां चंपा की सुगंध फैल जाती है, जबकि आसपास चंपा का कोई वृक्ष नहीं होता। स्थानीय जनश्रुतियों में इसे जंगल की यक्षिणी की उपस्थिति माना जाता है।
चार खंडों में विकसित होती है कथा
उपन्यास को चार खंडों—बीज, अंकुरण, अनुगूँज और अंतर्ध्वनि—में विभाजित किया गया है। कहानी ठीक उसी तरह विकसित होती है, जैसे कोई वन धीरे-धीरे अपना विस्तार और वैभव प्राप्त करता है।
रतनपुर की प्राचीन राजधानी, अमरकंटक के तपस्थल, चांगभखार के वन क्षेत्र और रामगढ़ की रहस्यमयी पहाड़ियों जैसे अनेक स्थलों का उल्लेख कथानक में अत्यंत प्रामाणिकता के साथ किया गया है। स्थानीय भूगोल, इतिहास, लोकविश्वास और सांस्कृतिक विरासत को कथा में सहजता से पिरोया गया है।
पहली कृति, लेकिन परिपक्व लेखन
उपन्यास की भाषा, कथानक और वर्णन शैली पाठकों को बांधे रखती है। यह विश्वास करना कठिन लगता है कि यह किसी लेखक की पहली प्रकाशित कृति है। लेखन में जिस परिपक्वता, संवेदनशीलता और कल्पनाशीलता का परिचय मिलता है, वह किसी अनुभवी साहित्यकार की रचना जैसा अनुभव कराती है।
प्रतीक्षा की कहानी, जो पाठकों को बुलाती है
‘यक्षिणी : मैकल की अनुगूँज’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि मैकल अंचल के जंगलों, लोकविश्वासों और रहस्यों की यात्रा है। यह ऐसी कथा है जो समाप्त नहीं होती, बल्कि पाठक के भीतर एक अनुगूँज छोड़ जाती है। शायद इसी कारण लेखक कहते हैं—यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है, यह अब भी प्रतीक्षा में है… और अब उस प्रतीक्षा का हिस्सा बनने की बारी पाठकों की है।

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