इस बार का बजट सत्र 28 जनवरी से शुरू हुआ था और कुल 81 दिनों की अवधि में लोकसभा और राज्यसभा की 31-31 बैठकें हुईं। सत्र को बीच-बीच में अवकाश देकर संसदीय समितियों को मंत्रालयों की अनुदान मांगों की समीक्षा का समय दिया गया। अंतिम चरण 16 अप्रैल से शुरू हुआ और 18 अप्रैल को समाप्त हो गया।
9 विधेयक पारित, सरकार ने दिखाया विधायी फोकस
पूरे सत्र के दौरान संसद के दोनों सदनों ने कुल 9 विधेयक पारित किए। इनमें वित्त विधेयक 2026, विनियोग विधेयक, औद्योगिक संबंध संहिता संशोधन, ट्रांसजेंडर अधिकार संरक्षण संशोधन, दिवालियापन संहिता संशोधन, आंध्र प्रदेश पुनर्गठन संशोधन और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल सामान्य प्रशासन विधेयक जैसे प्रमुख कानून शामिल रहे।
सरकार के लिए यह सत्र विधायी दृष्टि से सफल माना जा सकता है, क्योंकि महत्वपूर्ण वित्तीय और प्रशासनिक विधेयकों को समय रहते पारित करा लिया गया।
महिला आरक्षण से जुड़े नए विधेयक नहीं बढ़ सके आगे
सत्र के अंतिम चरण में सरकार ने लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीट आरक्षण से जुड़े तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए। इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक शामिल थे।
हालांकि संविधान संशोधन विधेयक आवश्यक बहुमत नहीं जुटा सका और आगे नहीं बढ़ पाया। बाकी दोनों विधेयकों पर भी कोई निर्णायक प्रगति नहीं हुई। इससे यह संकेत मिला कि महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर सहमति अभी भी अधूरी है।
लोकसभा में कम चर्चा, राज्यसभा ज्यादा सक्रिय
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को लेकर दोनों सदनों का प्रदर्शन अलग-अलग रहा। लोकसभा में 18 घंटे तय समय के मुकाबले चर्चा केवल 2 घंटे 46 मिनट चली और सिर्फ 6 सदस्यों ने भाग लिया। इसके विपरीत राज्यसभा में यह बहस 17 घंटे 20 मिनट चली और 81 सदस्यों ने हिस्सा लिया।
यह अंतर बताता है कि निचले सदन में राजनीतिक टकराव ने चर्चा को सीमित किया, जबकि उच्च सदन अपेक्षाकृत संवाद का मंच बना रहा।

बजट और अनुदान मांगों पर व्यापक बहस
केंद्रीय बजट 1 फरवरी को पेश किया गया। लोकसभा में इस पर लगभग 13 घंटे और राज्यसभा में साढ़े 16 घंटे चर्चा हुई। बाद में विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों पर भी विचार हुआ। रेल मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, ग्रामीण विकास और पर्यावरण मंत्रालय जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा दर्ज की गई।
अध्यक्ष हटाने का प्रस्ताव भी रहा चर्चा में
10 मार्च को लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने का प्रस्ताव भी सदन में लाया गया। इस पर दो दिन तक 12 घंटे से अधिक चर्चा चली, जिसमें 53 सांसदों ने हिस्सा लिया। अंततः प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया, लेकिन इससे विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच तनाव खुलकर सामने आया।
उत्पादकता के आंकड़े चौंकाने वाले
पूरे सत्र में लोकसभा की उत्पादकता लगभग 93 प्रतिशत और राज्यसभा की 110 प्रतिशत दर्ज की गई। राज्यसभा का 100 प्रतिशत से अधिक उत्पादकता तक पहुंचना यह दर्शाता है कि निर्धारित समय से अधिक कामकाज हुआ।
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल उत्पादकता प्रतिशत ही संसदीय गुणवत्ता का पैमाना नहीं हो सकता। महत्वपूर्ण यह भी है कि कितनी गंभीर बहस हुई, कितने निजी सदस्य विधेयक आए और विपक्ष को कितना अवसर मिला।
यह सत्र सरकार के लिए प्रशासनिक रूप से सफल, लेकिन राजनीतिक रूप से मिश्रित संकेत देने वाला रहा। एक ओर वित्तीय विधेयक पारित हुए, दूसरी ओर महिला आरक्षण और व्यापक बहसों के मोर्चे पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।
आने वाले मानसून सत्र में यही देखा जाएगा कि क्या सरकार लंबित संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दों पर व्यापक सहमति बना पाती है, या संसद फिर टकराव और व्यवधान की राह पर लौटेगी।




















