
दरअसल, एसडीएम नूतन कंवर की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने के लिए चरणबद्ध रणनीति तैयार की है। बैठक के तुरंत बाद ही बुधवार को नगर पालिका का अमला एक्शन मोड में नजर आया और शहर की सड़कों पर मार्किंग करते हुए अतिक्रमण की सीमा तय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। इससे यह संकेत साफ मिल रहा है कि इस बार प्रशासन केवल योजना तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्रवाई की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।
प्रशासन की योजना के मुताबिक पहले संबंधित लोगों को नोटिस दिया जाएगा, फिर राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर सड़क की वास्तविक चौड़ाई का सर्वे किया जाएगा और उसके बाद नियमों के अनुसार अतिक्रमण हटाया जाएगा। खास बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी रखने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि किसी तरह का विवाद न हो।

हालांकि, बालोद में अतिक्रमण का इतिहास बताता है कि यह समस्या नई नहीं है। वर्ष 1960-61 में भी लोहरा-बलोद मार्ग पर अतिक्रमण को लेकर एक बड़ा मामला सामने आया था, जिसमें सड़क की जमीन पर कब्जा करने का आरोप लगा था। उस समय भी सड़क की वास्तविक चौड़ाई को लेकर विवाद हुआ था—रिकॉर्ड में जहां 67 फीट चौड़ाई दर्ज थी, वहीं मौके पर यह करीब 40 फीट ही पाई गई।

उस प्रकरण में यह भी सामने आया था कि कई निर्माण दशकों पुराने थे और केवल कुछ फीट तक ही सड़क की ओर बढ़े हुए थे। ऐसे में तत्कालीन प्रशासन ने सख्ती के बजाय व्यावहारिक रुख अपनाते हुए अतिक्रमण हटाने के बजाय उसे प्रीमियम लेकर नियमित कर दिया था। 1962 में यह मामला बंद तो हो गया, लेकिन शहर में अतिक्रमण की समस्या जड़ से खत्म नहीं हो पाई।
आज भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। कई प्रमुख सड़कों की चौड़ाई कागजों में 20 फीट से अधिक है, लेकिन अतिक्रमण के चलते कई जगहों पर यह 8 फीट तक सिमट चुकी है। इसका सीधा असर यातायात व्यवस्था और आपातकालीन सेवाओं पर पड़ रहा है।
व्यापारियों और जनप्रतिनिधियों ने भी प्रशासन के सामने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि वैध दस्तावेज रखने वालों के साथ न्याय होना चाहिए। प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि पहले समझाइश दी जाएगी और लोगों को खुद अतिक्रमण हटाने का मौका मिलेगा, लेकिन इसके बाद भी सहयोग नहीं मिलने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

फिलहाल प्रशासन ने 10 दिनों के भीतर सदर क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार कार्रवाई वास्तव में जमीन पर टिक पाएगी या फिर 1962 की तरह यह भी एक फाइल में सिमटकर रह जाएगी।
बालोद में अतिक्रमण की यह कहानी केवल वर्तमान कार्रवाई नहीं, बल्कि दशकों से चले आ रहे एक ऐसे चक्र की झलक है, जहां हर बार शुरुआत तो होती है, लेकिन समाधान अधूरा रह जाता है। अब देखना होगा कि प्रशासन की यह नई पहल इस पुराने घाव का स्थायी इलाज बन पाती है या नहीं।




















