प्रदेश रूचि

वेलेंटाइन-डे पर ‘संस्कारों का उत्सव’: 500 बच्चों ने किया मातृ-पितृ पूजन, भावुक हुआ बालोद

बालोद।जहां 14 फरवरी को दुनिया प्रेम के इज़हार के रूप में वेलेंटाइन-डे मनाती है, वहीं बालोद में प्रेम का एक अलग और भावनात्मक रूप देखने को मिला। श्री योग वेदांत सेवा समिति और पुरुषोत्तम राजपूत के संयोजन में जिला मुख्यालय स्थित सरस्वती शिशु मंदिर प्रांगण में 500 बच्चों ने अपने माता-पिता की पूजा-अर्चना कर मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाया। पिछले नौ वर्षों से निरंतर जारी यह पहल इस बार भी आस्था, संस्कार और संवेदनाओं से ओतप्रोत रही।


शनिवार दोपहर आयोजित कार्यक्रम में बच्चों ने पूजा की थाली सजाकर दीप प्रज्वलित किए और अपने माता-पिता को आसन पर विराजित कर विधिवत पूजन किया। अक्षत, रोली, गुलाल और फूल अर्पित करते हुए आरती उतारी, चरण स्पर्श कर मुंह मीठा कराया और अंत में गले लगाकर आशीर्वाद लिया। अपने बच्चों के हाथों सम्मान पाकर कई माता-पिता की आंखें खुशी से नम हो गईं।
तीन वर्ष के नन्हे बालक से लेकर युवा वर्ग तक की सहभागिता ने कार्यक्रम को विशेष बना दिया। पूरे वातावरण में भक्ति गीत, भजन-कीर्तन और सत्संग की स्वर लहरियां गूंजती रहीं। जिलेभर से पहुंचे सैकड़ों महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने धार्मिक वातावरण में सहभागिता निभाई।


संस्कारों की पाठशाला बना आयोजन
आयोजक पुरुषोत्तम राजपूत ने बताया कि वर्ष 2017 से प्रारंभ हुई यह पहल बच्चों और युवाओं को संस्कारवान बनाने की दिशा में एक सतत प्रयास है। उनका कहना है कि माता-पिता और गुरुजनों के प्रति सम्मान की भावना बच्चों में एकाग्रता, संयम और उत्साह का विकास करती है। कार्यक्रम में गीता-भागवत के सत्संग और मंत्रोच्चार के साथ विधिवत पूजन कराया गया, ताकि बाल मन में दिव्य संस्कारों की स्थापना हो सके।


संस्कृति से जुड़ाव का संदेश
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आयोजन किसी पाश्चात्य परंपरा का विरोध नहीं, बल्कि अपनी भारतीय संस्कृति से नई पीढ़ी को परिचित कराने की सकारात्मक पहल है। वैलेंटाइन-डे के दिन प्रेम की परिभाषा को व्यापक बनाते हुए माता-पिता के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का यह प्रयास समाज में पारिवारिक मूल्यों को सुदृढ़ करने का संदेश देता है।

लगातार नौ वर्षों से निर्वहन हो रही यह परंपरा अब जिले की पहचान बनती जा रही है। आयोजन ने यह साबित किया कि प्रेम केवल शब्दों या प्रतीकों तक सीमित नहीं, बल्कि माता-पिता के चरणों में झुककर व्यक्त की गई कृतज्ञता में भी उसका सर्वोच्च स्वरूप निहित है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!