
दरअसल, महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा कार्यक्रम के लिए जारी किए गए आमंत्रण पत्र में नगर पालिका परिषद बालोद के सभापति और महिला बाल विकास समिति की सभापति गोमती रात्रे का नाम शामिल नहीं किए जाने से जनप्रतिनिधियों में नाराजगी खुलकर सामने आ गई है। इस मुद्दे को लेकर सभापति गोमती रात्रे सहित पार्षद गोकुल ठाकुर, प्रीतम साहू, पुष्पा साहू और श्यामा यादव ने कलेक्टर से मुलाकात कर विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने आमंत्रण पत्र को संशोधित कर जनप्रतिनिधियों का नाम शामिल करने की मांग की है। गोमती रात्रे ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर सुनवाई नहीं हुई तो वे मामले को प्रदेश स्तर तक ले जाएंगी।
वहीं इस पूरे विवाद में नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिभा चौधरी भी खुलकर सामने आ गई हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना को गरीब एवं मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए सरकार की मंशा की सराहना की, लेकिन महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि विभागीय अधिकारियों द्वारा जनप्रतिनिधियों की अनदेखी लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है।

नपाध्यक्ष ने आरोप लगाया कि मामले की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने महिला एवं बाल विकास अधिकारी समीर पांडे से संपर्क करने के लिए कई बार फोन किया, लेकिन अधिकारी ने कॉल रिसीव नहीं किया और न ही वापस संपर्क किया। उन्होंने इसे जनप्रतिनिधियों का अपमान बताते हुए कहा कि विभाग को आदिवासी महिला जनप्रतिनिधि का नाम आमंत्रण पत्र में शामिल करने में आखिर क्या परेशानी है। उन्होंने कहा कि यदि उनके पीआईसी सदस्य और पार्षद का सम्मान नहीं किया जाता तो इसे वे व्यक्तिगत अपमान मानती हैं।
प्रतिभा चौधरी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे इस योजना या कार्यक्रम का विरोध नहीं करेंगी क्योंकि यह बेटियों के विवाह से जुड़ा संवेदनशील विषय है, लेकिन अधिकारियों की मनमानी और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने मांग की कि संबंधित अधिकारी जनप्रतिनिधियों से सार्वजनिक रूप से माफी मांगें, अन्यथा इस मुद्दे को उच्च स्तर तक उठाया जाएगा।

अब यह मामला प्रशासन और सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधियों के बीच टकराव का रूप लेता नजर आ रहा है। ऐसे में सभी की निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हुई हैं कि वह विवाद को सुलझाने के लिए क्या रुख अपनाता है और क्या जनप्रतिनिधियों की नाराजगी दूर हो पाती है या यह मामला और ज्यादा सियासी तूल पकड़ता है।
बहरहाल, मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना जैसे सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्यक्रम के बीच उभरा यह विवाद प्रशासनिक कार्यप्रणाली और जनप्रतिनिधियों की भागीदारी को लेकर कई सवाल खड़े कर रहा है।




















