केंद्रीय बजट 2026-27 को सरकार ने विकास, निवेश और स्थिरता का दस्तावेज़ बताया है, लेकिन इस बजट को अगर गांव, किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कसौटी पर परखा जाए, तो तस्वीर उतनी सरल नहीं दिखती। संसद में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश यह बजट एक ओर आर्थिक अनुशासन और पूंजीगत निवेश की बात करता है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी छोड़ जाता है कि क्या गांव और खेत इस विकास यात्रा में सचमुच बराबर के साझेदार बन पाएंगे।
सरकार का सबसे मजबूत तर्क इन्फ्रास्ट्रक्चर और पूंजीगत व्यय है। सड़क, रेल, लॉजिस्टिक्स और निर्माण क्षेत्र में भारी निवेश निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था को गति देता है और रोजगार के अवसर भी पैदा करता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह नीति भारत को दीर्घकालिक विकास के पथ पर ले जाने में मदद कर सकती है। सकारात्मक पक्ष यह है कि सरकार ने अल्पकालिक लोकलुभावन फैसलों से बचते हुए भविष्य की नींव मजबूत करने की कोशिश की है।
लेकिन सवाल यह है कि इस विकास की रफ्तार गांव तक कितनी तेजी से पहुंचेगी। कृषि क्षेत्र के लिए बजट में निरंतरता जरूर दिखती है, पर कोई बड़ा संरचनात्मक सुधार या आय में त्वरित राहत देने वाला स्पष्ट संकेत नजर नहीं आता। किसान आज भी उत्पादन लागत, बाजार मूल्य और कर्ज के दबाव से जूझ रहा है। बजट में योजनाओं का उल्लेख तो है, लेकिन जमीन पर किसानों की आय बढ़ाने को लेकर ठोस और भरोसेमंद रोडमैप अब भी अधूरा लगता है।
ग्रामीण रोजगार और आजीविका की बात करें तो सरकार ने मौजूदा योजनाओं को जारी रखने का भरोसा दिया है, लेकिन यह भी सच है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की गुणवत्ता और स्थायित्व एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। अगर गांव की क्रय शक्ति नहीं बढ़ी, तो शहरी उद्योगों और बाजारों में मांग कैसे टिकेगी—यह सवाल बजट के चमकदार आंकड़ों के पीछे दबा हुआ है।
राजनीतिक दृष्टि से यह बजट ‘सुरक्षित संतुलन’ की नीति अपनाता दिखता है। न तो ऐसा कोई फैसला जो बड़े असंतोष को जन्म दे और न ही ऐसा साहसिक कदम, जो गांव और किसान को यह महसूस कराए कि सरकार उनके संकट को लेकर असाधारण गंभीर है। सरकार मानो यह मानकर चल रही है कि निरंतरता ही भरोसे की गारंटी है, लेकिन ग्रामीण भारत में भरोसा केवल निरंतरता से नहीं, बल्कि ठोस परिणामों से बनता है।
फिर भी यह मानना होगा कि बजट पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। ग्रामीण बुनियादी ढांचे, कृषि से जुड़े सहायक क्षेत्रों और महिला ग्रामीण उद्यमिता पर दिया गया जोर सकारात्मक संकेत देता है। यदि इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ, तो गांव की अर्थव्यवस्था को नई सांस मिल सकती है। समस्या नीति की मंशा से ज्यादा उसके अमल की है—जहां अक्सर बजट की अच्छी बातें फाइलों में सिमट कर रह जाती हैं।
कुल मिलाकर केंद्रीय बजट 2026-27 विकास की भाषा तो बोलता है, लेकिन गांव उस भाषा में अपनी चिंता का अनुवाद ढूंढ रहा है। यह बजट उद्योग और निवेश को भरोसा देता है, पर किसान को अभी भी आश्वासन के साथ-साथ ठोस राहत की प्रतीक्षा है। सरकार के सामने असली चुनौती अब आंकड़े पेश करने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की है कि ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना में गांव और किसान सिर्फ भाषण का हिस्सा नहीं, बल्कि नीति के केंद्र में हैं।
संपादकीय रूप में देखा जाए, तो यह बजट न पूरी तरह विफल है, न पूरी तरह सफल। यह एक अवसर है—अगर सरकार गांव और किसान के सवालों को गंभीरता से लेकर नीतियों को जमीन पर उतार पाती है, तो यही बजट आने वाले वर्षों में उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। अन्यथा, यह भी उन बजटों में गिना जाएगा, जिनमें विकास का सपना तो था, पर गांव की नींद टूटी ही नहीं।




















