प्रधानमंत्री के नाम सौंपे गए ज्ञापन में उल्लेख किया गया है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने और समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यूजीसी द्वारा बनाए गए नए नियम 13 जनवरी 2026 से प्रभावशील कर दिए गए हैं। हालांकि महासभा का आरोप है कि इन नियमों के तहत सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों एवं प्राध्यापकों पर आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर सीधे कार्रवाई की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। नियमों में ऐसी कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है, जिससे आरोपित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का समान अवसर मिल सके। इससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है और यह एकपक्षीय कार्रवाई को बढ़ावा देने वाला प्रावधान प्रतीत होता है।

राजपूत क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष लोमश सिंह ने कहा कि प्रश्नाधीन नियमों के परिप्रेक्ष्य में यह आवश्यक है कि समानता के अधिकार के अंतर्गत सवर्ण समुदाय के विद्यार्थियों एवं प्राध्यापकों के हितों का भी संरक्षण किया जाए। महासभा ने इन नियमों को अस्वीकार करते हुए सरकार से मांग की है कि नियमों में आंशिक संशोधन कर ऐसा तंत्र विकसित किया जाए, जिसमें छात्रों और शिक्षकों को प्राकृतिक न्याय के अनुरूप अपना पक्ष रखने का अवसर मिले, साथ ही यदि लगाए गए आरोप गलत सिद्ध होते हैं तो झूठे आरोप लगाने वालों के विरुद्ध भी नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित हो।
इस विरोध प्रदर्शन के दौरान अध्यक्ष लोमश सिंह, सचिव लोकपाल गुगेल, संजय बैश, पुष्पाजित सिंह, विजय सिंह, पुरुषोत्तम सिंह, आशीष चंदेल, पूनम सिंह, संगीता सिंह, हेमलता सिंह सहित बड़ी संख्या में राजपूत समाज के लोग उपस्थित रहे।
उधर, यूजीसी के नए कानून को लेकर देशभर में चल रहे विरोध के बीच आज “Supreme Court of India” ने इस पर 19 मार्च तक के लिए रोक लगाते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश के बाद विरोध को और बल मिला है। राजपूत क्षत्रिय महासभा ने न्यायालय के निर्णय का उल्लेख करते हुए केंद्र सरकार से इस कानून को निरस्त करने अथवा इसमें आवश्यक संशोधन करने की मांग दोहराई है। महासभा का कहना है कि जब तक सभी वर्गों के लिए न्यायसंगत और संतुलित प्रावधान नहीं किए जाते, तब तक इस तरह के नियम उच्च शिक्षा व्यवस्था में असंतोष और विवाद को जन्म देते रहेंगे।




















