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बीमा क्लेम खारिज करना पड़ा महंगा, उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल

बिलासपुर। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, बिलासपुर ने एक अहम निर्णय में बीमा कंपनियों की मनमानी पर कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने स्पष्ट कहा है कि पॉलिसी जारी करने से पहले स्वयं मेडिकल जांच कराने के बाद भी बीमा दावा खारिज करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह उपभोक्ता संरक्षण कानून और IRDAI के दिशा-निर्देशों के भी खिलाफ है।

मामला कौशल प्रसाद कौशिक द्वारा ली गई मैक्स लाइफ इंश्योरेंस कंपनी की प्लैटिनम वेल्थ प्लान पॉलिसी से जुड़ा है। इस पॉलिसी के अंतर्गत बीमित उनकी पत्नी शैल कौशिक थीं, जिनकी बीमा राशि एक करोड़ रुपये निर्धारित थी। पॉलिसी के लिए प्रति वर्ष दस लाख रुपये का प्रीमियम नियमित रूप से जमा किया गया था। पॉलिसी जारी करने से पहले बीमा कंपनी द्वारा बीमित का संपूर्ण मेडिकल परीक्षण कराया गया, जिसमें उन्हें पूरी तरह स्वस्थ बताया गया था।

आदेश में बताया गया कि सितंबर 2020 में बीमित महिला कोविड-19 संक्रमण की चपेट में आ गईं और उपचार के दौरान अक्टूबर 2020 में उनका निधन हो गया। इसके बाद नामित उपभोक्ता द्वारा बीमा कंपनी के समक्ष मृत्यु लाभ का दावा प्रस्तुत किया गया, लेकिन कंपनी ने फरवरी 2021 में यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि बीमित को वर्ष 2016 से हृदय संबंधी बीमारी थी, जिसकी जानकारी प्रस्ताव पत्र में नहीं दी गई थी। कंपनी ने केवल प्रीमियम की राशि लौटाकर अपना दायित्व समाप्त मान लिया।।।

आयोग ने अपने फैसले में कहा कि बीमा कंपनी यह साबित करने में असफल रही कि कथित बीमारी पॉलिसी प्रारंभ होने से पूर्व के 48 महीनों की अवधि में सक्रिय थी या उसका कोई उपचार चल रहा था। IRDAI के नियमों के अनुसार, पॉलिसी शुरू होने से चार वर्ष से अधिक पुरानी बीमारी को पूर्व विद्यमान बीमारी नहीं माना जा सकता। ऐसे में केवल पुराने रिकॉर्ड के आधार पर दावा खारिज करना पूरी तरह गलत है।

आयोग ने यह भी टिप्पणी की कि जब बीमा कंपनी ने स्वयं अपने पैनल अस्पतालों के माध्यम से सभी आवश्यक मेडिकल जांच कराई और पूरी तरह संतुष्ट होकर पॉलिसी जारी की, तो बाद में उसी आधार पर उपभोक्ता पर बीमारी छिपाने का आरोप लगाना न्यायसंगत नहीं है। यह बीमा कंपनी की जिम्मेदारी थी कि वह पॉलिसी जारी करने से पहले जांच की संपूर्णता सुनिश्चित करती।
निर्णय में कहा गया कि बीमा कंपनी का यह आचरण सेवा में स्पष्ट कमी की श्रेणी में आता है। आयोग ने माना कि दावा अस्वीकार करना न केवल उपभोक्ता के अधिकारों का हनन है, बल्कि यह बीमा क्षेत्र में भरोसे को भी कमजोर करता है।

यह फैसला बीमा धारकों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जिससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि बीमा कंपनियां मनमाने आधार पर दावे खारिज नहीं कर सकतीं। उपभोक्ता आयोग का यह आदेश भविष्य में ऐसे मामलों में बीमा कंपनियों की जवाबदेही तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

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