सोमवार को जिला विपणन विभाग ने संबंधित ट्रांसपोर्टर दमन मनदीप रोड लाइंस को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए 24 घंटे के भीतर लिखित जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। नोटिस में स्पष्ट पूछा गया है कि कोड़ेवा धान खरीदी केंद्र से रवाना हुआ ट्रक तय समय में मालीघोरी संग्रहण केंद्र क्यों नहीं पहुंचा और आखिर पांच दिन बाद वह दमकसा–बढ़भूम मार्ग के जंगल क्षेत्र में लावारिस हालत में कैसे मिला। विभाग ने इस पूरे मामले को धान परिवहन नियमों का गंभीर उल्लंघन मानते हुए जवाब देना अनिवार्य बताया है।
जिला विपणन विभाग ने साफ किया है कि ट्रांसपोर्टर को मंगलवार को किसी भी स्थिति में जवाब देना होगा। संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में भुगतान रोकने, दंडात्मक कार्रवाई करने और भविष्य में धान परिवहन कार्य से वंचित करने जैसे कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।

इधर, सोमवार देर शाम पुलिस और प्रशासनिक समन्वय के बाद ट्रक को गुरुर थाना परिसर से मालीघोरी संग्रहण केंद्र लाया गया। सोमवार रात ट्रक की धर्मकांटा में तौल कराई गई, जबकि मंगलवार को धान खाली करने की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। प्रशासन का दावा है कि धान सुरक्षित है, हालांकि ट्रक के लंबे समय तक लापता रहने को लेकर जांच जारी है।
इस मामले में नया मोड़ तब आया जब ट्रांसपोर्टर कंपनी के जनरल मैनेजर तोरण दुबे ने ट्रक चालक हरि प्रसाद केंवट के खिलाफ बालोद थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में बताया गया है कि ट्रक क्रमांक CG 08 AV 1711, 13 जनवरी को कोड़ेवा से 900 कट्टा धान लेकर मालीघोरी पहुंचा था। तकनीकी खराबी का हवाला देते हुए ट्रक वहीं खड़ा रहा, लेकिन 16 जनवरी की रात चालक ने ट्रक का GPS बंद कर उसे दमकसा–बढ़भूम मार्ग पर छोड़ दिया और स्वयं चला गया।
पुलिस ने मामले को गंभीर मानते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 316(3) के तहत चालक के खिलाफ आपराधिक न्यास भंग का मामला दर्ज कर विवेचना शुरू कर दी है। ट्रक को खाद्य विभाग द्वारा जब्त कर सुरक्षार्थ गुरुर थाना परिसर में रखा गया था।

हालांकि, शिकायत और पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है। जब ट्रक मालीघोरी संग्रहण केंद्र तक पहुंच चुका था, तो उसे वहां से दमकसा–बढ़भूम मार्ग की ओर क्यों ले जाया गया। यदि इस संबंध में चालक और कंपनी प्रबंधन के बीच बातचीत हुई थी, तो उसका उल्लेख रिपोर्ट में क्यों नहीं किया गया—यह जांच का अहम बिंदु माना जा रहा है।
इस पूरे मामले ने धान परिवहन में लागू GPS ट्रैकिंग सिस्टम की प्रभावशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शासन जहां ट्रकों की मिनट-टू-मिनट निगरानी का दावा करता है, वहीं मात्र 40 किलोमीटर की दूरी तय करने वाला ट्रक पांच दिन तक गायब रहा और न तो विभाग को समय पर इसकी जानकारी मिली, न ही ट्रांसपोर्टर ने किसी स्तर पर सूचना दी।
जिला विपणन विभाग का कहना है कि ट्रांसपोर्टर के जवाब और पुलिस जांच के निष्कर्ष के बाद ही पूरे मामले में जिम्मेदारी तय की जाएगी। यदि लापरवाही या नियमों का उल्लंघन सामने आता है, तो ठेकेदार के साथ-साथ निगरानी से जुड़े अधिकारियों की भूमिका की भी समीक्षा की जाएगी।
धान खरीदी जैसे संवेदनशील कार्य में हुई यह चूक न केवल जिम्मेदारों की लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि किसानों की उपज की सुरक्षा और सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।




















