चार दिन बाद वही ट्रक बालोद–कांकेर जिले की सीमा से लगे गांव बढ़भूम दमकसा के पास घने जंगल में सड़क किनारे लावारिस हालत में मिला, जिसने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
धान खरीदी के बाद परिवहन कार्य को सबसे संवेदनशील प्रक्रिया माना जाता है। शासन के निर्देशों के अनुसार इस पूरी व्यवस्था की निगरानी GPS ट्रैकिंग सिस्टम के जरिए की जाती है, जिसमें ट्रकों की मिनट-टू-मिनट मॉनिटरिंग की जाती है। इसके बावजूद 40 किलोमीटर की दूरी तय करने वाला ट्रक चार दिन तक गायब रहा, यह सीधे तौर पर प्रशासनिक निगरानी और परिवहन ठेकेदार की गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
न ठेकेदार सतर्क, न अधिकारी जिम्मेदार
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रक के गायब रहने की जानकारी न तो परिवहन ठेकेदार ने समय रहते दी और न ही संबंधित विभाग ने कोई अलर्ट जारी किया। यदि स्थानीय ग्रामीण जंगल में खड़े ट्रक को न देखते, तो शायद यह मामला सामने ही नहीं आता।
ग्रामीणों द्वारा सूचना दिए जाने के बाद जब प्रशासनिक टीम देर रात मौके पर पहुंची, तो स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश देखने को मिला। लोगों का कहना था कि यदि धान सुरक्षित नहीं है तो खरीदी व्यवस्था का क्या औचित्य है।

जिम्मेदारी से बचते नजर आए अधिकारी
मामले को लेकर जब जिला विपणन अधिकारी टिकेंद्र राठौर से सवाल किए गए, तो उन्होंने जांच के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की बात कही। हालांकि, चार दिन तक ट्रक के लापता रहने और GPS सिस्टम के निष्क्रिय रहने पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया।

बड़ा सवाल: GPS था तो ट्रक कैसे गायब हुआ?
यह मामला सिर्फ एक ट्रक के लापता होने का नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल है, जिसे सरकार पारदर्शिता की मिसाल बताती है।
यदि GPS निगरानी के बावजूद धान से भरा ट्रक जंगल में खड़ा रह सकता है और किसी को खबर नहीं होती, तो यह लापरवाही नहीं बल्कि व्यवस्था की गंभीर विफलता है।

अब कार्रवाई होगी या मामला दबेगा?
फिलहाल प्रशासन जांच की बात कह रहा है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि
क्या जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई होगी?
क्या परिवहन ठेकेदार की जवाबदेही तय होगी?
या यह मामला भी जांच के नाम पर फाइलों में दब जाएगा?
धान खरीदी जैसे संवेदनशील कार्य में ऐसी लापरवाही न केवल किसानों के भरोसे को तोड़ती है, बल्कि सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है।




















