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बालोद में दो तस्वीरें: पौधरोपण के रिकॉर्ड के बीच खेतों में कटते अर्जुन पेड़, प्रशासनिक चुप्पी पर सवाल

बालोद। बालोद जिले ने पिछले एक वर्ष में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अलग पहचान बनाई है। जिले के कलेक्टर के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर किए गए वृक्षारोपण अभियानों ने न केवल समाज के हर वर्ग को प्रकृति से जोड़ा, बल्कि इन्हीं प्रयासों के चलते बालोद को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी मिला। जिला प्रशासन की अपील पर स्कूलों, सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों ने बढ़-चढ़कर सहभागिता निभाई और जिले में वृक्षारोपण ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया।


यह पहल नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए संदेश ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान की भावना से भी जुड़ती है, जिसका उद्देश्य केवल पेड़ लगाना नहीं, बल्कि उन्हें सहेजने और भावनात्मक रूप से संरक्षण से जोड़ना है।
बारिश थमते ही कटाई का खेल
हालांकि, तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही चिंताजनक है। बारिश का मौसम खत्म होते ही और ग्रामीण क्षेत्रों में फसल कटाई के बाद, हर साल खुलेआम पेड़ों की कटाई शुरू हो जाती है। यह सब कुछ वन विभाग और राजस्व विभाग की जानकारी में होने के बावजूद उनके “नाक के नीचे” चलता नजर आता है।
स्थिति यह है कि दिसंबर से मई के बीच जितने पेड़ काटे जाते हैं, उनकी संख्या कई बार पूरे साल लगाए गए पौधों से कहीं अधिक होती है।

अर्जुन पेड़ों पर सबसे ज्यादा वार
जानकारी के मुताबिक इन महीनों में विभिन्न प्रजातियों के पेड़ों की कटाई होती है, लेकिन सबसे ज्यादा हरे-भरे अर्जुन पेड़ों पर कुल्हाड़ी चल रही है। जबकि शासन स्तर पर अर्जुन पेड़ों की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध है। इसके बावजूद खुलेआम कटाई होना प्रशासन की अनदेखी या फिर लकड़ी माफियाओं के साथ सांठगांठ की ओर इशारा करता है।
कटे हुए पेड़ों को आरामिलों तक पहुंचाने वाला पूरा नेटवर्क सक्रिय है, लेकिन प्रभावी कार्रवाई न होने से इनके हौसले बुलंद हैं।


प्रशासन की अग्निपरीक्षा
अब देखने वाली बात यह होगी कि जिला प्रशासन इस पूरे मामले को कितनी गंभीरता से लेता है। क्या जिलेभर में खुलेआम हो रही अवैध कटाई पर ठोस रोक लगेगी? क्या ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियानों की भावना को जमीन पर उतारते हुए लगाए गए और बचे हुए पेड़ों को भी उतनी ही मजबूती से बचाया जाएगा?
पर्यावरण संरक्षण तभी सार्थक होगा, जब वृक्षारोपण के साथ-साथ अवैध कटाई पर सख्त और निरंतर कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए। बालोद के लिए यह सिर्फ हरियाली बचाने का नहीं, बल्कि अपनी बनाई पहचान को कायम रखने का भी सवाल है।

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