
2 दिसंबर 2025 को भेजे गए अपने विस्तृत पत्र में अग्रवाल ने कहा है कि कलेक्टर गाइडलाइन में की गई भारी वृद्धि बिना जन–परामर्श, सामाजिक-आर्थिक अध्ययन और वास्तविक बाजार मूल्यांकन के लागू कर दी गई है, जिसका सीधा असर किसानों, छोटे व्यवसायियों, मध्यम वर्ग और ग्रामीण आबादी पर पड़ेगा। उन्होंने लिखा कि रजिस्ट्री शुल्क और अन्य प्रक्रिया शुल्क बढ़ जाने से जमीन का क्रय-विक्रय कठिन हो जाएगा और इससे राज्य के बाजार, व्यापार और खासकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने इसे “जन-ऑफ लिविंग” और “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” की अवधारणा के विपरीत बताया।
सांसद अग्रवाल ने उदाहरण देते हुए कहा कि नवा रायपुर और उसके आसपास के गांवों में जमीनों को शहरी मानकों पर कीमत देना अनुचित है। इससे ग्रामीण किसानों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ पड़ेगा और जमीन की वास्तविक कीमत तथा उनकी आर्थिक क्षमता में भारी असंतुलन पैदा होगा। उन्होंने कहा कि राज्य के विभिन्न इलाकों से लगातार विरोध की खबरें आ रही हैं, जिसके चलते यह बढ़ोतरी आम जनता के लिए असहनीय सिद्ध हो रही है।

अग्रवाल ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि 20 नवंबर 2025 से लागू की गई नई गाइडलाइन को तत्काल स्थगित कर दिया जाए। साथ ही उन्होंने पंजीयन शुल्क को 4 प्रतिशत से घटाकर पुनः 0.8 प्रतिशत करने की भी अनुशंसा की है, ताकि आम लोगों को राहत मिल सके। उन्होंने सुझाव दिया कि विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर इस पूरे प्रकरण की समीक्षा की जाए और जमीनी हकीकत व वास्तविक बाजार मूल्य के आधार पर नई नीति तैयार की जाए।
गौरतलब है कि प्रदेशभर में अचानक कई गुना बढ़ी गाइडलाइन दरों के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। व्यापारी, किसान, रियल एस्टेट कारोबारी और मध्यमवर्ग संयुक्त रूप से इसे अव्यावहारिक बता रहे हैं। कई स्थानों पर स्थानीय नेताओं को भी जनता की नाराजगी का सामना करना पड़ा है। आर्थिक जानकारों का कहना है कि यदि यह वृद्धि यथावत रखी गई, तो जमीनों की खरीदी-बिक्री लगभग ठप होने की स्थिति बन सकती है।
अब प्रदेश की नजर मुख्यमंत्री के निर्णय पर है कि क्या वे सांसद बृजमोहन अग्रवाल की मांग और बढ़ते जनविरोध को देखते हुए गाइडलाइन वृद्धि को स्थगित करने का बड़ा फैसला लेते हैं या इसे जारी रखते हैं।




















