
कलेक्टर की फटकार के बाद भी नहीं सुधरे हालात
लगातार मिल रही शिकायतों के बाद बालोद कलेक्टर ने स्वयं मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया था। निर्माण कार्य की धीमी रफ्तार और अव्यवस्था देखकर उन्होंने PWD अधिकारियों और ठेकेदार को कड़ी फटकार लगाई थी। कुछ दिनों तक काम तेज हुआ, लेकिन अब फिर वही ढर्रा लौट आया है — सड़क अधूरी, नालियां अधूरी और डिवाइडर अधर में लटका हुआ।
गलत सर्वे और अधूरी योजना बनी बड़ी चूक
यह कार्य PWD उप संभाग क्रमांक 1, बालोद के अधीन है। करीब 592.63 लाख रुपये की लागत से “मे. सेवा सिंह ओबेरॉय एंड कंपनी” को यह ठेका सौंपा गया था, जिसमें निविदा दर 20 प्रतिशत कम रखी गई थी।
परियोजना के अनुसार सड़क के बीच 80 सेंटीमीटर चौड़ा डिवाइडर बनना था, दोनों ओर 9-9 मीटर क्षेत्र में 5.5 मीटर सड़क, 1.75 मीटर साइड सोल्डर और 1-1 मीटर नाली का निर्माण प्रस्तावित था।
लेकिन तकनीकी सर्वे गलत निकलने से जमीन अधिग्रहण और अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया ही ठीक से नहीं हो पाई — यही वजह है कि शुरुआत से ही काम अटक गया।

पुरानी पाइपलाइन और अतिक्रमण से ठप काम
निर्माण क्षेत्र के नीचे पुरानी जल पाइपलाइन होने के बावजूद शिफ्टिंग का बजट ही नहीं रखा गया, परिणामस्वरूप जैसे ही काम शुरू हुआ, कई घरों की जल आपूर्ति बाधित हो गई।
अब विभाग ने मजबूरी में 2 करोड़ 15 लाख रुपये का नया प्रस्ताव तैयार कर रायपुर स्थित अधीक्षण अभियंता को भेजा है।
उधर, अतिक्रमण और बिजली पोल शिफ्टिंग में भी बड़ी दिक्कतें हैं। डिवाइडर से निकली मिट्टी तक हटाई नहीं गई है, जिससे सड़क और ज्यादा अव्यवस्थित हो गई है।

ठेकेदार के हित में नियमों की अनदेखी
सूत्रों का कहना है कि विभाग ठेकेदार की सुविधा को ध्यान में रखकर काम कर रहा है। पुराने जिला अस्पताल, सहकारी बैंक और पुलिस लाइन के आसपास अब भी कई सरकारी और निजी इमारतें सड़क सीमा के अंदर हैं, लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते विभाग अपने नक्शे से हटकर काम कर रहा है।
कलेक्टर की सख्त चेतावनी के बावजूद कोई सुधार नहीं
कलेक्टर ने निरीक्षण के दौरान साफ कहा था कि – “कार्य की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होगा और जनता को असुविधा नहीं होनी चाहिए।”
फिर भी विभागीय मशीनरी उसी रफ्तार पर चल रही है। सूत्र बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी सब-इंजीनियर दिनेश माहेश्वरी के पास थी, लेकिन लापरवाही के चलते उन्हें फिलहाल प्रोजेक्ट से अलग कर दिया गया है।
जनता में नाराज़गी, सवाल अब भी बरकरार
करीब 7.40 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाले इस प्रोजेक्ट में अब भी 90 प्रतिशत काम बाकी है। अब सवाल उठता है —
जब कार्यादेश 25 जून 2025 को जारी हुआ था और अवधि सिर्फ 5 माह की थी, तो नवंबर तक यह स्थिति क्यों?
क्या विभागीय उदासीनता और ठेकेदार की मनमानी मिलकर जनता के विकास कार्यों को रोक रही है?
अब निगाहें प्रशासन पर
अब देखना यह होगा कि कलेक्टर की फटकार के बाद विभाग और ठेकेदार कितना गंभीर रुख अपनाते हैं। जनता उम्मीद कर रही है कि इस बार चेतावनी नहीं, ठोस कार्रवाई देखने को मिलेगी — वरना यह सड़क भी अधूरी फाइलों और धूल में ही दबकर रह जाएगी।




















