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“साधना हजार, पर कृपा एक ही वरदान — स्वामी युगल शरण जी का प्रवचन बना चर्चा का विषय”

माया से छुटकारा भगवान की कृपा से ही संभव — स्वामी युगल शरण जी

बालोद। ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 20 दिवसीय विलक्षण दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला के पांचवें दिन शनिवार को डॉ. स्वामी युगल शरण जी महाराज ने ‘भगवत् कृपा’ विषय पर गूढ़ आध्यात्मिक विचार रखे। सरदार वल्लभभाई पटेल मैदान में आयोजित इस प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। स्वामी जी ने कहा कि भगवान को केवल उनकी कृपा से ही जाना जा सकता है, न कि अपने बल, बुद्धि या अध्ययन से।

माया नित्य है, पर उससे मुक्ति संभव

स्वामी जी ने कहा — “वेदों में स्पष्ट कहा गया है कि माया नष्ट नहीं हो सकती, क्योंकि यह नित्य तत्व है। किंतु इससे छुटकारा पाया जा सकता है। भगवान या जीव माया को समाप्त नहीं कर सकते, परंतु उसकी सीमा से पार हो सकते हैं।”
उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति भगवान की शरण में जाता है, वही माया से पार पा सकता है। “दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया, मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते” (गीता 7.14) का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने कहा — “यह श्रीकृष्ण की दैवी शक्ति है, जिसे साधना मात्र से नहीं जीता जा सकता, केवल भगवान की कृपा से ही माया से मुक्ति संभव है।”

भगवान को जानने का उपाय

स्वामी जी ने कहा कि भगवान को न तो प्रवचन सुनकर, न शास्त्र पढ़कर, न बुद्धि के बल से जाना जा सकता है। “गीता या भागवत के श्लोक कंठस्थ करने से ज्ञानाभिमान उत्पन्न होता है, जो भगवान से दूरी का कारण बनता है। जब तक ईश्वर की कृपा नहीं होगी, तब तक ब्रह्मा या बृहस्पति भी भगवान को नहीं जान सकते।”
उन्होंने श्वेताश्वतरोपनिषद् का उल्लेख करते हुए कहा — “तपः प्रभावाद्देवप्रसादाच्च” — अर्थात् साधना के साथ हरि-प्रसाद अर्थात् भगवान की कृपा आवश्यक है।

भगवान की कृपा कैसे मिले?

स्वामी जी ने कहा कि भगवत् कृपा प्राप्त करने का मार्ग गुरु और संत की शरण में है। “तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत” (मुण्डकोपनिषद् 2.1.12) और “तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया” (गीता 4.34) का उल्लेख करते हुए कहा — “जो व्यक्ति भगवत् प्राप्त संत की शरण ग्रहण करता है, वह भी भगवत् प्राप्ति का अधिकारी बन जाता है।”

उन्होंने कहा कि सच्चे संत का मिलना अत्यंत दुर्लभ है। “अनंत जन्मों में जब हमारे शुभ संस्कार जागृत होते हैं, तब कृपा का द्वार खुलता है और ईश्वर हमें वास्तविक संत से मिलाते हैं। ऐसे संत का सान्निध्य ही कृपा का प्रथम संकेत है।”

क्या भगवान सबके कर्म के कर्ता हैं?

प्रवचन के दौरान स्वामी जी ने एक जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा — “यह कहना कि भगवान की इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता — और साथ ही यह कहना कि जो जैसा करता है वैसा भरता है — दोनों बातें सही हैं।”
उन्होंने समझाया कि भगवान प्रयोजक कर्ता हैं, जो मन, बुद्धि और इन्द्रियों को शक्ति देते हैं, जबकि जीव प्रयोज्य कर्ता है, जो उस शक्ति का उपयोग करता है। “भगवान शक्ति देते हैं, पर उसका प्रयोग कैसे करना है यह जीव पर निर्भर करता है।”

भगवान की कृपा का मूल्य

स्वामी जी ने कहा — “भगवान बिनु हेतु सनेही हैं, वे अकारण करुणामय हैं। तुलसी, मीरा, सूरदास पर जैसी कृपा हुई, वैसी कृपा हम पर भी तभी होगी जब हम स्वयं को योग्य बनाएंगे। भगवान कृपा का मूल्य नहीं लेते, पर कृपा पात्रता अवश्य देखते हैं।”

अंत में स्वामी जी ने कहा कि माया से छुटकारा और भगवान की प्राप्ति एक ही सूत्र में बंधे हैं — भगवत् कृपा में। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि “यदि जीवन में सच्ची भक्ति और शरणागति आ जाए, तो भगवान की कृपा स्वतः प्राप्त हो जाती है।”

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