बालोद। ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 20 दिवसीय विलक्षण दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला के तृतीय दिवस पर स्वामी युगल शरण जी महाराज ने अपने विशिष्ट अंदाज़ में श्रद्धालुओं को आत्मज्ञान और आस्तिकता का गूढ़ संदेश दिया। इस अवसर पर उनका स्वागत माल्यार्पण और पुष्पगुच्छ प्रदान कर किया गया।
स्वामी जी ने विषय रखा — “जीव के प्रतिपल आनंद चाहने पर भी अभी तक क्यों नहीं मिला?”
उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव क्षण-प्रतिक्षण आनंद चाहता है, परंतु आनंद अभी तक इसलिए नहीं मिला क्योंकि जीव ने गलत दिशा पकड़ ली है।

स्वामी जी ने कहा — “हमने अपने वास्तविक स्वरूप को भुला दिया है। हम आत्मा हैं, यह जानते हुए भी स्वयं को देह मान लिया है। आनंद इन्द्रियों का विषय नहीं, आत्मा का विषय है। देह को सुख देने से आत्मा को आनंद नहीं मिलता।
जीव भगवान का अंश है
स्वामी जी ने कहा कि भगवान की तीन प्रमुख शक्तियाँ हैं — स्वरूप शक्ति, जीव शक्ति और माया शक्ति।
उन्होंने बताया कि जीव शक्ति स्वयं भगवान श्रीकृष्ण की विशिष्ट शक्ति है, इसलिए जीव को भगवान का अंश कहा गया है।
उन्होंने कहा — “जीव भगवान की शक्ति होने के कारण उनका सनातन अंश है, जो माया में फँसकर स्वयं को भूल गया है।”

क्यों कहा गया जीव को ‘नास्तिक’?
स्वामी जी ने कहा — “प्रत्येक जीव आनंद चाहता है, और आनंद भगवान का पर्याय है। इसलिए कोई जीव सच्चा नास्तिक नहीं हो सकता। परंतु जो भगवान को जानता नहीं, सूक्ष्म रूप में अनुभव नहीं करता — वह व्यवहारिक रूप से नास्तिक है।”
उन्होंने रामायण का उदाहरण देते हुए कहा —
“जो मोहिं राम लागते मीठे, सो षटरस नवरस अनरस रस ह्वै जाते सब फीके।”
अर्थात जिसने भगवान का रस चख लिया, उसे संसार के रस फीके लगते हैं। आज के समय में लोग राम नाम को भी अमंगल मानने लगे हैं, यही हमारी आस्तिकता की विडंबना है।
भगवान का क्या अर्थ है?
स्वामी जी ने कहा — “जो षडैश्वर्य से सम्पन्न हैं, वे ही भगवान हैं।”
उन्होंने बताया कि भगवान के आठ गुण हैं — अपहतपाप्मा, विजरो, विमृत्यु, विशोक, विजिघत्सो, अपिपास:, सत्यकाम: और सत्यसंकल्प: — यही ईश्वरत्व के लक्षण हैं।

भगवान हमें पुकारते हैं, पर हम नहीं सुनते
स्वामी जी ने कहा — “भगवान सर्वव्यापक हैं, वे हर क्षण हमें पुकारते हैं, लेकिन हम बहिर्मुखता और पाप की धूल से ढके होने के कारण उनकी पुकार नहीं सुन पाते। हमें संसार की आवाज़ सुनाई देती है, भगवान की नहीं।”
उन्होंने कहा — “हम भोग लगाते हैं, पर भाव नहीं बनाते — यही हमारी आस्तिकता का रूप है।”
भगवान से प्रेम कब होगा?
स्वामी जी ने कहा — “भगवान को जानेंगे, तभी मानेंगे; मानेंगे, तभी विश्वास होगा; और विश्वास होगा, तभी प्रेम उत्पन्न होगा।”
उन्होंने वेद वाक्य उद्धृत करते हुए कहा — “तमेव विदित्वाति मृत्युमेति” — अर्थात भगवान को इसी मानव जीवन में जान लो, नहीं तो यह दुर्लभ अवसर फिर नहीं मिलेगा।

भगवान को बुद्धि से नहीं जाना जा सकता
स्वामी जी ने माण्डूक्य उपनिषद् का उल्लेख करते हुए कहा —
“भगवान अदृष्ट, अव्यवहार्य, अचिन्त्य और अद्वैत हैं — उन्हें केवल अनुभव से जाना जा सकता है, तर्क या बुद्धि से नहीं।”
उन्होंने कहा — “जो व्यक्ति संसार के नियमों की तरह आध्यात्मिक क्षेत्र में भी श्रम करेगा, वही भगवान का अनुभव कर सकेगा। भगवान का स्मरण, प्रेम और पुकार — यही हमारी आत्मिक कमाई है, जो हमारे साथ जाएगी।”
स्वामी युगल शरण जी ने कहा — “भगवान को बिना जाने आस्तिकता अधूरी है। आनंद, आस्था और प्रेम की प्राप्ति तभी संभव है जब जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर ईश्वर की ओर मुड़े।”




















