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स्वामी युगल शरण जी ने कहा — संसार का हर जीव आनंद की खोज में है, और सच्चा आनंद केवल भगवान के चरणों में ही संभव है।

हर जीव का लक्ष्य ‘आनंद प्राप्ति’ है — स्वामी युगल शरण जी

बालोद। सरदार वल्लभभाई पटेल मैदान में चल रहे जगदगुरू श्री कृपालु जी महाराज के प्रमुख प्रचारक स्वामी युगल शरण जी महाराज के दार्शनिक प्रवचन के दूसरे दिवस पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। स्वामी जी ने अपने प्रवचन में जीवन, आत्मा और आनंद के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक जीव आस्तिक है और उसका चरम लक्ष्य केवल आनंद प्राप्ति है।

स्वामी जी ने कहा कि संसार में कोई भी जीव बिना प्रयोजन के कोई कार्य नहीं करता। “प्रयोजनमनुद्दिश्य मंदोऽपि न प्रवर्तते”— दर्शनशास्त्र का यह सिद्धांत बताता है कि हर क्रिया के पीछे कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है। उन्होंने कहा कि परोपकार करने से संतों को सुख मिलता है, जबकि अपकार करने से दुष्टों को क्षणभंगुर आनंद मिलता है। इस प्रकार सुख या आनंद प्राप्त करना ही प्रत्येक जीव का प्रयोजन है।

स्वामी जी ने कहा कि हम आत्मा हैं, यह जानते हुए भी अनुभव के अभाव में स्वयं को शरीर मानते हैं। जब हम स्वयं को नहीं जानते, तब यह भी नहीं जानते कि हमारा सच्चा संबंधी कौन है। उन्होंने कहा कि संसार के सभी संबंध स्वार्थ पर आधारित और अस्थायी हैं, जबकि भगवान के साथ संबंध निःस्वार्थ और नित्य है। “भगवान ही हमारे वास्तविक संबंधी हैं, जो जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे साथ रहते हैं।”

उन्होंने भावपूर्ण शैली में कहा— “जो अपने आपको नहीं जानता, वही पागल है। संसार रूपी पागलखाने में सभी पागल हैं, परंतु संत भी पागल हैं— फर्क इतना है कि हम संसार के पीछे पागल हैं और संत संसार के रचयिता के पीछे।”

स्वामी जी ने कहा कि विश्व में कोई भी जीव नास्तिक नहीं हो सकता, क्योंकि हर जीव आनंद चाहता है और आनंद ही ईश्वर का पर्याय है। “जो आनंद चाहता है, वह स्वयं ईश्वर का उपासक है,” उन्होंने कहा।

गीता और उपनिषदों का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने कहा कि जीव ईश्वर का अंश है और उसी के स्वभाव के अनुरूप आनंद ही चाहता है। “ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः” — यह सिद्ध करता है कि जीव का स्वभाव ही आनंद है।

उन्होंने बताया कि भौतिकवाद की उन्नति से अंतःकरण की शुद्धि संभव नहीं, सच्चा सुख केवल अध्यात्म से ही प्राप्त हो सकता है। “वेद कहते हैं — ‘रसो वै सः’, अर्थात् ईश्वर ही आनंदस्वरूप हैं, और उन्हें प्राप्त करके ही जीव आनंदमय हो सकता है।”

विभिन्न दर्शनों का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने कहा कि भारत के सभी 12 दर्शन प्रणालियों — चाहे चार्वाक, बौद्ध, जैन या वेदान्त — सभी का अंतिम लक्ष्य आनंद की प्राप्ति ही है।

अंत में स्वामी जी ने कहा — “प्रत्येक जीव का चरम लक्ष्य आनंद प्राप्ति है, और वह आनंद केवल भगवान के चरणों में ही संभव है।”

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