महिलाओं ने सायंकालीन अर्घ्य के दौरान तालाब में वेदी बनाकर कमरभर पानी में खड़े होकर डूबते सूरज को अर्घ्य अर्पित किया। इस दौरान “छठी मईया की जय” के जयघोष से पूरा परिसर गूंज उठा। मंगलवार की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ पर्व का समापन होगा।
संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना
यूपी-बिहार छठ पर्व समिति के सदस्यों ने बताया कि यह पर्व परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की दीर्घायु और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए मनाया जाता है। व्रती महिलाएं चार दिन तक कठोर उपवास रखती हैं और विशेष श्रृंगार के साथ भगवान सूर्य की उपासना करती हैं। हाथों में मेहंदी, सिर पर पूजा की टोकरी और आंखों में श्रद्धा का भाव – हर व्रती का आचरण समर्पण का प्रतीक दिखाई दिया।

पौराणिक कथा: जब देवमाता अदिति ने की थी छठी मैया की आराधना
मान्यता है कि प्रथम देवासुर संग्राम में जब देवता असुरों से पराजित हुए, तब देवमाता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न पुत्र आदित्य का वरदान दिया, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलाई। कहा जाता है, तभी से छठ पर्व की परंपरा का शुभारंभ हुआ और यह उत्सव देव सेना षष्ठी देवी को समर्पित हो गया।
सामूहिक श्रद्धा और सांस्कृतिक एकता की झलक
छठ पर्व के अवसर पर बालोद का बूढ़ा तालाब परिसर उत्तर प्रदेश और बिहार के निवासियों से भर गया। महिलाएं पारंपरिक गीतों के साथ घाटों पर पूजा-अर्चना करती रहीं, वहीं पुरुष श्रद्धालु व्यवस्था और सहयोग में जुटे रहे। दीपों की रोशनी और लोकगीतों की गूंज ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
दृश्य भावनाओं से परिपूर्ण थे – सूर्यास्त की पृष्ठभूमि में झिलमिलाती जलधारा, कलश, फल और सुपारी से सजी टोकरी, और माथे पर सिंदूर लगाए व्रती महिलाओं की श्रद्धा ने नगर में अध्यात्म का अनोखा समा बाँध दिया।




















