
पंडित मनोज शुक्ल ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बाल लीलाओं के माध्यम से जहां राक्षसों का विनाश किया, वहीं ब्रजवासियों को प्रेम और आनंद का संदेश दिया।

गोवर्धन पर्वत की महिमा का वर्णन
कथा के दौरान शुक्ल ने बताया कि एक दिन श्रीकृष्ण ने देखा कि ब्रजवासी तरह-तरह के पकवान बना रहे हैं और पूजा की तैयारी में जुटे हैं। जब उन्होंने माता यशोदा से पूछा तो उन्होंने बताया कि सब लोग इंद्रदेव की पूजा कर रहे हैं ताकि वर्षा अच्छी हो और फसलें लहलहा उठें। इस पर कृष्ण ने कहा कि वर्षा करना तो इंद्र का कर्तव्य है — पूजन तो गोवर्धन पर्वत का होना चाहिए, क्योंकि वही हमारी गायों को चार देता है और फल-फूल, सब्जियां भी उसी से मिलती हैं। कृष्ण की यह बात सुनकर ब्रजवासी इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे, और तभी से गोवर्धन पूजा की परंपरा की शुरुआत हुई।

कथा में यजमान भूपेंद्र दुबे, पूनम दुबे, धर्मेंद्र दुबे, अर्चना दुबे, अटल दुबे, स्वेता दुबे, राजकुमार टूवाणी, संजय चौधरी, प्रमोद दुबे सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाएं, पुरुष और बच्चे उपस्थित रहे।
मरारपारा में चल रही यह भागवत कथा लोगों के लिए न सिर्फ भक्ति का उत्सव बनी है, बल्कि अध्यात्म और आस्था का जीवंत अनुभव भी करा रही है।




















