रायपुर। नवा रायपुर के जनसंपर्क संचालनालय में अपर संचालक संजीव तिवारी पर हुआ हमला केवल एक प्रशासनिक घटना नहीं, बल्कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर भी गहरे प्रश्नचिह्न छोड़ गया है। गुरुवार दोपहर घटी यह सनसनीखेज वारदात अब पत्रकारिता जगत में मंथन का विषय बन गई है — क्या अब कलम की जगह हाथ उठने लगे हैं?
क्या है मामला
9 अक्टूबर 2025 को दोपहर करीब 12:30 बजे, जनसंपर्क विभाग के अपर संचालक संजीव तिवारी अपने कार्यालय में वरिष्ठ पत्रकार पवन दुबे से चर्चा कर रहे थे। इसी दौरान चार अज्ञात व्यक्ति दफ्तर में घुस आए। प्रारंभ में तिवारी को लगा कि वे किसी शासकीय कार्य से आए होंगे, लेकिन कुछ ही क्षणों में माहौल तनावपूर्ण हो गया।
शिकायत के मुताबिक, काले शर्ट में आए एक युवक — जिसने अपना नाम तौसिफ या तौकीर बताया — ने अचानक तिवारी से बदसलूकी शुरू कर दी और आरोप लगाया कि उन्होंने उसके किसी साथी के साथ दुर्व्यवहार किया है। बात बढ़ी तो स्थिति हिंसक हो गई। युवक ने तिवारी की गर्दन पकड़ ली, जबकि अन्य ने कंप्यूटर, प्रिंटर और कुर्सियों में तोड़फोड़ कर दी। जाते-जाते आरोपियों ने धमकी दी — “घर में घुसकर देख लेंगे।”
शिकायत पत्र के अनुसार हमले में संजीव तिवारी की गर्दन में चोट आई है। घटना की सूचना पर राखी थाना पुलिस ने 4 अज्ञात आरोपियों के खिलाफ BNS की धारा 324(4), 221, 132, 296, 351(2), 3(5) और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम की धारा 3(2) के तहत मामला दर्ज किया है। जांच का जिम्मा निरीक्षक आशीष सिंह को सौंपा गया है, जबकि पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है।
पत्रकारिता और हिंसा: एक चिंतन
यह मामला केवल सरकारी दफ्तर में हमला नहीं, बल्कि पत्रकारिता के मूल स्वभाव पर प्रहार जैसा है। पत्रकार समाज का दर्पण होता है — सवाल पूछता है, जवाब खोजता है, लेकिन जब वही संवाद हिंसा में बदलने लगे तो यह पेशे की आत्मा को आहत करता है।
पत्रकार का हथियार उसकी कलम है, न कि मुट्ठी।
आज जब प्रेस की स्वतंत्रता पहले से अधिक महत्वपूर्ण है, ऐसे में यदि पत्रकार या पत्रकार कहलाने वाले व्यक्ति निजी रंजिश या आक्रोश के चलते सरकारी अधिकारी से हाथापाई पर उतर आएँ, तो यह पेशे की गरिमा पर धब्बा है।
पत्रकारिता का असली धर्म संवाद और विवेक है — असहमति भी गरिमा के साथ रखी जा सकती है। लेकिन हालिया घटनाएं दिखा रही हैं कि संवेदनशीलता और संयम की जगह आक्रोश और आत्म-प्रदर्शन ने ले ली है। यही वह मोड़ है जहां पत्रकारिता को आत्ममंथन की जरूरत है।
प्रशासन और मीडिया — रिश्तों में आई दरार
जनसंपर्क विभाग जैसे संस्थान शासन और मीडिया के बीच सेतु का कार्य करते हैं। यदि वहीं पर संवाद की जगह विवाद हो जाए, तो यह दोनों पक्षों के लिए नुकसानदेह है।
सवाल यह भी है कि क्या आज मीडिया के कुछ वर्ग संवाद की मर्यादा भूल चुके हैं? क्या “खबर बनाने” की जल्दबाज़ी ने संयम और शालीनता को पीछे छोड़ दिया है?
कलम की ताकत से ही लड़ाइयाँ जीती जाती हैं
घटना की पुलिस जांच जारी है, दोषी चाहे कोई भी हो, कार्रवाई आवश्यक है। लेकिन इस घटना को केवल अपराध के दायरे में नहीं देखा जा सकता — यह पत्रकारिता के चरित्र और जिम्मेदारी पर पुनर्विचार का अवसर है। पत्रकार समाज की चेतना का प्रहरी होता है, और जब प्रहरी ही मर्यादा तोड़े, तो समाज की नींव हिलने लगती है।हिंसा कभी भी विचार का विकल्प नहीं हो सकती।
कलम की ताकत ने ही आज़ादी दिलाई थी — और वही ताकत लोकतंत्र की असली पहचान है।




















