
प्रतिमाओं का विसर्जन गंगासागर तालाब और तांदुला जलाशय में विधि-विधान और जोत-जवारा के साथ किया गया। श्रद्धालुओं ने मां दुर्गा की प्रतिमा को पंडाल से लेकर तालाब तक विदाई दी। कई जगह भक्तों की आंखें नम हो गईं, क्योंकि नौ दिनों की आराधना के बाद मां की प्रतिमा को विदा किया जा रहा था। वहीं, महिलाओं और युवाओं ने जोत-जवारा लेकर आस्था की परंपरा को निभाया।

डीजे-धुमाल पर थिरके युवा, झांकियों ने बढ़ाया आकर्षण
शहर की विभिन्न दुर्गा समितियों ने डीजे-धुमाल और लाउडस्पीकर पर सेवा गीत और जयकारों के साथ शोभायात्रा निकाली। कई समितियों ने बाहर से आए कलाकारों की झांकियां भी प्रस्तुत कीं। सदर मार्ग पर दुर्गा, काली और सरस्वती की प्रतिमाओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं। यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस ने बड़े वाहनों का प्रवेश बंद कर दिया था और सिर्फ दुपहिया वाहनों को अनुमति दी गई।
सड़कों पर उमड़ी भीड़, तालाब किनारे भरा जनसैलाब
तालाबों के चारों ओर हजारों की संख्या में श्रद्धालु मां दुर्गा की विदाई देखने पहुंचे। पुलिस को ट्रैफिक व्यवस्था संभालने में खासी मशक्कत करनी पड़ी। नवरात्रि भर जहां नगर में गरबा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही, वहीं अंतिम दिन श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता था।

प्रसाद और सेवा से बढ़ा उत्साह
इस वर्ष कचहरी चौक, जयस्तंभ चौक, कर्मा कॉम्प्लेक्स और गंगासागर तालाब पार सहित शहर के प्रमुख चौक-चौराहों पर श्रद्धालुओं को पोहा, प्रसाद और पानी वितरित किया गया। युवाओं की टीमों ने सेवा स्टॉल लगाकर भक्तों का स्वागत किया।

भक्ति में झूमे श्रद्धालु, बैगा ने किया शांत
विसर्जन शोभायात्रा के दौरान कई भक्त माता की भक्ति में लीन होकर झूमने लगे। डांग-डोरी और सेवा गीतों के बीच कुछ भक्त तालाब तक झूमते हुए पहुंच गए, जिन्हें बैगा द्वारा मंत्रोच्चार और धूप से शांत कराया गया।

परंपरा निभाते हुए हुआ विसर्जन
ग्राम और वार्ड स्तर के पंडालों से प्रतिमाएं ट्रकों पर सजी हुई निकाली गईं। तालाब पहुंचने पर पुजारियों ने मंत्रोच्चार और आरती के साथ विधिवत विसर्जन किया। बालोद में परंपरा अनुसार, दशहरे के अगले दिन ही अधिकांश प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। इसी परंपरा को निभाते हुए शुक्रवार को पूरे नगर में दुर्गा विसर्जन का दौर चला और नवरात्रि महोत्सव का समापन हुआ।




















