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अष्टमी पर हवन-पूजन और भंडारे में उमड़ा आस्था का सैलाब, श्रद्धालुओं संग वानर ने भी ग्रहण की प्रसादी ,मानी गई शुभ घड़ी

बालोद। शारदीय नवरात्रि की अष्टमी पर मंगलवार को पूरे जिले में आस्था और श्रद्धा का सागर उमड़ पड़ा। मां महागौरी की आराधना के साथ जगह-जगह हवन, पूजन और भंडारे के आयोजन हुए। शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक देवी मंदिरों में दिनभर मंत्रोच्चार और आहुति की गूंज रही। कहीं सुबह 11 बजे तो कहीं दोपहर 12 बजे से शुरू हुए हवन कार्यक्रम देर शाम तक चलते रहे। शीतला मंदिर में दोपहर एक बजे पंडितों ने वैदिक मंत्रों के साथ अग्निकुंड प्रज्वलित किया और श्रद्धालु माता के चरणों में आहुति देते रहे।

नया बस स्टैंड परिसर पर जय मां काली दुर्गोत्सव समिति की ओर से विशाल भंडारे का आयोजन हुआ। प्रसादी से पूर्व कन्याओं का पूजन किया गया और मां काली की हवन-पूजन कर पूर्णाहुति दी गई। इसके बाद दोपहर 1 बजे से शुरू हुए भंडारे में हजारों श्रद्धालुओं ने हलवा, पूड़ी, दाल, चावल, सब्जी और काले चने का प्रसाद ग्रहण किया।

श्रद्धालुओं के साथ वानर भी भंडारे में हुए शामिल

लेकिन इस बार का भंडारा सिर्फ भक्तों के लिए ही यादगार नहीं रहा, बल्कि एक अद्भुत दृश्य ने सबका ध्यान खींच लिया। आयोजन के दौरान वानरों का एक झुंड भी पंडाल में पहुंचा और और उसमें से एक वानर श्रद्धालुओं के बीच बैठकर प्रसादी ग्रहण करने लगा। श्रद्धालु आश्चर्यचकित थे, परंतु हर कोई इस दृश्य को शुभ संकेत मानते हुए मुस्कुराता नजर आया। कई लोगों ने इसे “मां की कृपा” बताते हुए अपने मोबाइल कैमरों में कैद किया।

धार्मिक मान्यता है कि जब किसी देवी-देवता के आयोजन में पशु-पक्षी या वानर जैसे जीव भी सम्मिलित हो जाते हैं, तो इसे दैवीय आशीर्वाद और मंगल का प्रतीक माना जाता है। कहा भी गया है— “जहाँ भक्तिभाव से भंडारा होता है, वहाँ देवता भी अदृश्य रूप से प्रसाद ग्रहण करते हैं।” मंगलवार का दिन स्वयं हनुमानजी को समर्पित होता है और अष्टमी पर वानरों का इस तरह प्रसाद ग्रहण करना भक्तों के लिए खासा प्रेरणादायी व शुभ संकेत माना गया।

शहर और आस-पास के क्षेत्रों में इस अद्भुत नजारे की चर्चा पूरे दिन होती रही।

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