
हड़ताल पर बैठे कर्मचारियों का कहना है कि यह आंदोलन किसी शौक से नहीं, बल्कि मजबूरी में किया जा रहा है। कर्मचारियों ने बताया कि बीते वर्षों में वे 160 से ज्यादा ज्ञापन शासन को सौंप चुके हैं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई न होने पर वे आंदोलन को मजबूर हुए।
प्रदेशभर के 16,000 से ज्यादा एनएचएम कर्मचारी नियमितीकरण/सविलियन, ग्रेड पे, लंबित 27% वेतन वृद्धि सहित 10 सूत्रीय मांगों को लेकर डटे हुए हैं। वहीं स्वास्थ्य सचिव ने आदेश जारी कर कर्मचारियों को ड्यूटी जॉइन करने की चेतावनी दी है, अन्यथा अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात कही है।
हालांकि, कर्मचारियों का उत्साह कम नहीं हुआ। उनका कहना है कि जब तक लिखित आदेश जारी नहीं हो जाते, आंदोलन जारी रहेगा।
सेवाएं ठप, ग्रामीण सबसे ज्यादा परेशान
हड़ताल के कारण शासकीय अस्पतालों में संस्थागत प्रसव, पैथोलॉजी जांच, टीबी-कुष्ठ-मलेरिया जांच, ओपीडी, नवजात शिशु देखभाल, आंगनबाड़ी स्वास्थ्य परीक्षण, पोषण पुनर्वास केंद्र, वृद्ध स्वास्थ्य परीक्षण और एनसीडी स्क्रीनिंग जैसी सेवाएं पूरी तरह ठप हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और गंभीर है, क्योंकि सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी भी हड़ताल पर हैं, जिससे आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का ओपीडी बंद पड़ा है।
सांसद विजय बघेल का समर्थन
इस बीच सांसद विजय बघेल ने भी कर्मचारियों की मांगों को जायज ठहराते हुए कहा कि घोषणा पत्र में जो वादे किए गए थे, उन पर सरकार को अमल करना चाहिए। उन्होंने आश्वासन दिया कि इस विषय पर वे स्वयं मुख्यमंत्री और मंत्री से चर्चा करेंगे।

सवालों के घेरे में सरकार
एक तरफ प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं पंगु हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर कर्मचारियों के घरों का चूल्हा ठंडा पड़ने की स्थिति है। मासूम बच्चे की तख्ती ने आज आंदोलन का दर्द साफ-साफ सामने रख दिया। सवाल यह है कि क्या सरकार अब भी चुप बैठी रहेगी या फिर इस मासूम की आंखों से झांकते संघर्ष को देखकर समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाएगी?




















