नई दिल्ली।भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों में तनाव अपने चरम पर पहुँच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय उत्पादों पर आयात शुल्क दोगुना कर दिया है। पहले से लागू 25% शुल्क के अलावा अब 25% और जोड़कर कुल 50% टैरिफ बुधवार से लागू हो गया। इस फैसले से भारत के लगभग 60 अरब डॉलर मूल्य के निर्यात पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
वार्ता असफल, टैरिफ दोगुना
अमेरिका चाहता था कि भारत रूसी तेल आयात बंद करे और कृषि व डेयरी सेक्टर को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोले। लेकिन भारत ने दोनों मांगों को अस्वीकार कर दिया। यही वजह रही कि वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच चल रही व्यापार वार्ता बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई और अमेरिका ने “दबाव की रणनीति” अपनाते हुए टैरिफ दोगुना कर दिया।
किन सेक्टरों पर असर
इस निर्णय से भारत के श्रम-गहन उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
वस्त्र उद्योग – 22 अरब डॉलर
रत्न-आभूषण और हीरा उद्योग – 15 अरब डॉलर
समुद्री उत्पाद – 10 अरब डॉलर
चमड़ा व अन्य – 13 अरब डॉलर
व्यापार विशेषज्ञों का अनुमान है कि इन क्षेत्रों में निर्यात 40 से 70 प्रतिशत तक घट सकता है।
भारत का बड़ा रुख
अमेरिका की इस कार्रवाई को भारत ने “धौंस” करार देते हुए सख्त रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा –“भारत किसी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। किसानों और छोटे उद्योगों का हित सर्वोपरि है। भारी कीमत चुकानी पड़े तो भी हम तैयार हैं।”
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ बातचीत जारी है, लेकिन भारतीय हितों की कीमत पर कोई समझौता नहीं होगा।
सरकार की रणनीति
मोदी सरकार ने अमेरिकी टैरिफ का सामना करने के लिए बहु-आयामी रणनीति तैयार की है –
1. नए बाज़ारों की तलाश – 40 देशों (ब्रिटेन, जापान, कोरिया, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका) को टारगेट कर निर्यात बढ़ाने की योजना।
2. टेक्सटाइल सेक्टर को प्राथमिकता – विशेष अभियान के तहत वस्त्र निर्यात को बढ़ावा।
3. नीति सुधार – 12 अरब डॉलर की आयकर राहत और सरल जीएसटी व्यवस्था।
4. वित्तीय सहायता – प्रभावित उद्योगों को सस्ते ऋण और राहत पैकेज।
5. कूटनीतिक संतुलन – रूस व चीन के साथ सहयोग गहरा कर अमेरिका पर निर्भरता कम करना।
विशेषज्ञों की राय
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, यह टैरिफ भारत के लिए तत्कालिक झटका है, लेकिन दीर्घकाल में यह आत्मनिर्भरता और नए वैश्विक बाजारों की तलाश की दिशा में अवसर भी बन सकता है। “भारत के पास मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और उपभोग-आधारित अर्थव्यवस्था का सहारा है। सरकार के त्वरित कदम इस संकट को झटका भर बनाकर छोड़ सकते हैं।” – प्रो. अरुण मेहता, अर्थशास्त्री
अमेरिका ने टैरिफ का धौंस दिखाकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश जरूर की है, लेकिन भारत का रुख साफ है – “देशहित सर्वोपरि है, दबाव में झुकना नहीं।” अब आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि कूटनीति और आर्थिक सुधारों के सहारे भारत इस संकट को अवसर में कैसे बदलता है।




















