6 हजार से ज्यादा तिरंगे तैयार, हर घर तिरंगा अभियान को मिल रही नई उड़ान
बालोद।बालोद जिले के छोटे से गांव बघमरा में इन दिनों सिलाई मशीनों की गूंज कुछ खास कह रही है। यहाँ की महिलाओं ने इस बार स्वतंत्रता दिवस को केवल मनाने की नहीं, बल्कि उसे जीने की ठानी है। हर घर तिरंगा अभियान के तहत गांव की चार स्वयं सहायता समूहों की 20 महिलाएँ अब तक 6,000 से ज्यादा तिरंगे झंडे तैयार कर चुकी हैं – और इसके बदले 2 लाख रुपये से अधिक की आमदनी भी अर्जित की है।
इन महिलाओं की मेहनत से सिर्फ झंडे नहीं, आत्मनिर्भरता की उम्मीदें भी सिल रही हैं। जय कपिलेश्वर, सहेली, नवज्योति और अम्बे समूह की महिलाएं दिन-रात झंडे बनाने में जुटी हैं। हर तिरंगे में सिर्फ तीन रंग नहीं, बल्कि मेहनत, गर्व और आत्मसम्मान भी बुना गया है।
तिरंगे में बुना गर्व और बदलाव
जय कपिलेश्वर समूह की तिजन बाई मुस्कुराते हुए बताती हैं – “हमारी मशीनें रुकती नहीं। हर तिरंगा सिर्फ कपड़ा नहीं, हमारी भावनाओं का प्रतीक है। अब हमें लगता है कि हम भी देश के लिए कुछ कर रहे हैं।”
सहेली समूह की देवकी विश्वकर्मा कहती हैं – “पहले छोटे-मोटे काम करके जैसे-तैसे घर चलता था। अब तिरंगे से कमाई हो रही है, बच्चों की पढ़ाई भी ठीक से हो रही है।” वहीं सरोजनी साहू (नवज्योति समूह) को सबसे ज्यादा खुशी तब मिलती है जब गाँव और शहर के घरों पर उनके बनाए तिरंगे लहराते हैं – “हर झंडा हमारे सपनों की उड़ान है।”
गुणवत्ता में कोई समझौता नहीं
महिलाएं तिरंगे की उच्च गुणवत्ता और सटीक रंग संयोजन का विशेष ध्यान रख रही हैं – केसरिया, सफेद और हरा – हर रंग तय मानकों के अनुसार जोड़ा जा रहा है। यह सिर्फ व्यवसाय नहीं, देशभक्ति की भावना है, जिसे ये महिलाएं हर सिलाई में महसूस कर रही हैं।

प्रशासन और बिहान का सहयोग
कलेक्टर दिव्या उमेश मिश्रा के निर्देश पर जिला प्रशासन ने इन समूहों को हरसंभव मदद दी है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के तहत महिलाओं को प्रशिक्षण, सामग्री और विपणन की सुविधा भी दी गई है। संकुल प्रभारी सुनीता खुंटे और सहायक परियोजना अधिकारी नितेश साहू ने बताया कि अब तक जिले के कुल 13 समूहों ने 8,000 तिरंगे बेच दिए हैं, जबकि 5,000 झंडों का नया ऑर्डर भी मिला है।
हर घर पर तिरंगा, हर मन में उत्साह
शहर की दुकानों और बाजारों में इन महिलाओं द्वारा बनाए गए झंडे उपलब्ध हैं। सुनीता खुंटे ने अपील की – “अपने घर पर तिरंगा जरूर फहराएं, क्योंकि यह सिर्फ झंडा नहीं, आपके देश के प्रति सम्मान है – और किसी गांव की महिला की मेहनत का फल भी।”
नतीजा साफ है – बघमरा की महिलाएं अब सिर्फ घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की यात्रा में शामिल हो चुकी हैं। इस स्वतंत्रता दिवस पर जब तिरंगा लहराएगा, तो उसमें कहीं न कहीं इन महिलाओं के हाथों की मेहनत भी शामिल होगी।




















