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“अब खादी चलती नहीं, चलाती है… रोज़गार भी और पहचान भी”…प्रदेशरुचि संपादक संतोष साहू की खादी बोर्ड अध्यक्ष राकेश पांडेय से खुलकर बातचीत

रायपुर।छत्तीसगढ़ की खादी अब किसी कोने में रखी चीज नहीं, बल्कि नए भारत का नया फैशन बनकर उभर रही है। इसकी कमान संभाली है राकेश पांडेय ने, जो इस वक्त छत्तीसगढ़ खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष हैं और सबसे बड़ी बात – सिर्फ कुर्सी पर नहीं बैठे हैं, जमीन पर दौड़ रहे हैं।

संतोष साहू (संपादक): पांडेय जी, आप पद संभालते ही दौरे पर निकल पड़े। कुछ खास वजह?

राकेश पांडेय:हां, क्योंकि काम कागज़ में नहीं, मैदान में होता है। खादी और ग्रामोद्योग की हालत सिर्फ रिपोर्ट पढ़ने से नहीं समझ आती। मैं खुद अंबिकापुर, बिलासपुर, चांपा, मैनपुर, सारागांव, गढ़िया, देवरबीजा, कांकेर, धमतरी जैसे दर्जनों जिलों में गया। बुनकरों से मिला, महिलाओं से बात की, मशीनों की हालत देखी। जो अच्छा था, उसे और बढ़ाने की सोची – जो कमी थी, उसे सुधारने की।

सवाल:युवाओं को खादी से जोड़ने की बात कर रहे हैं। क्या सिर्फ स्लोगन है?

पांडेय:बिलकुल नहीं। आज के युवा ब्रांड और ट्रेंड चाहते हैं – हम वही कर रहे हैं। खादी को ट्रेंडी बना रहे हैं। डिजाइनिंग सॉफ्टवेयर, डिजिटल प्रिंट, टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी – सब ला रहे हैं। खादी के कपड़े अब कॉलेज, ऑफिस, शादी-ब्याह हर जगह फिट होंगे।

सवाल: सर, योजनाओं का हाल क्या है? असल में कुछ हो भी रहा है?

पांडेय: काम दिख रहा है, और बड़े पैमाने पर हो रहा है। इस साल पीएमईजीपी के तहत 972 और सीएमईजीपी के तहत 502 इकाइयों को मंजूरी दी गई। करीब 14 हजार लोगों को रोजगार मिला।
दूसरी तरफ, खादी प्रोडक्शन भी तेज़ी से बढ़ रहा है – 9 जगहों पर खादी और रेशम का प्रोडक्शन हुआ, जिससे 600 से ज्यादा महिलाएं और बुनकर जुड़े। बस्तर के डिमरापाल में बांस कला से 35 कारीगरों को रोज़गार मिला।

सवाल: सरकारी आंकड़े तो आते रहते हैं, लेकिन खादी की असली पहचान कैसे बनेगी?

पांडेय: पहचान बनती है मेहनत से और भरोसे से। हम दोनों पर काम कर रहे हैं। हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने जो “वोकल फॉर लोकल” का मंत्र दिया है, उसी सोच को हम छत्तीसगढ़ के गांवों तक ले जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जी खुद गांव-गांव की चिंता करते हैं – उनका साफ संदेश है कि “गांव मजबूत होगा, तो राज्य आत्मनिर्भर बनेगा।”

सवाल: फ्यूचर प्लान क्या है? सिर्फ रोजगार या कुछ और?

पांडेय: रोज़गार तो है ही, लेकिन अब ब्रांडिंग, ई-कॉमर्स, इंटरनेशनल मार्केट – इन सब पर फोकस है। हर जिले में खादी फैशन शो, वर्कशॉप, नवाचार प्रतियोगिता होगी।
हम चाहते हैं कि लोग खादी पहनकर गर्व महसूस करें – क्योंकि ये सिर्फ कपड़ा नहीं, खुद के पैरों पर खड़े होने का प्रतीक है।

सवाल: एक लाइन में संदेश?

पांडेय:खादी अब बीते वक्त की चीज़ नहीं – ये आने वाले कल की पहचान बनने जा रही है। और गांवों के हुनर को सिर्फ बाजार नहीं, सम्मान भी दिलाना है।

राकेश पांडेय की अगुवाई में खादी सिर्फ धागा नहीं रही – ये रोज़गार, आत्मनिर्भरता और पहचान की डोरी बन चुकी है।
प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री साय की सोच को ज़मीन पर उतारने की ये कोशिश अब रंग ला रही है।
अब खादी सलीके से नहीं, जोश और जुनून से पहनी जाएगी।

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