
कथा के दौरान पं. राधव मिश्रा ने शिवभक्ति और जीवन दर्शन से जुड़े कई प्रेरणादायक प्रसंग सुनाए। उन्होंने कहा—“जो व्यक्ति किसी संत या मंदिर तक पैदल जाता है, उसे प्रत्येक कदम के बदले अश्वमेध यज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है।”
उन्होंने कथा सुनने वालों के तीन प्रकार बताए—
1. पहला, जो कथा में सोते रहते हैं,
2. दूसरा, जो केवल त्रुटियाँ ढूंढते हैं,
3. और तीसरा, जो केवल कथा सुनने आता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि “सच्चा शिवभक्त वही है जिसे केवल कथा से मतलब होता है।”

राधव मिश्रा ने बताया कि यज्ञ दो प्रकार के होते हैं— एक जिसमें आहुतियाँ दी जाती हैं और दूसरा, जिसमें भूखों को भोजन कराया जाता है। उन्होंने कहा कि किसी धार्मिक अनुष्ठान में शिवभक्त की उपस्थिति आवश्यक है क्योंकि उसकी उपस्थिति से यदि कोई त्रुटि हो भी जाए, तो भगवान शिव उसे क्षमा कर देते हैं।
कथा में उन्होंने यह भी कहा—“गले में सोने की चैन हो तो चोर की नजर रहती है, लेकिन रुद्राक्ष की माला हो तो भगवान भोलेनाथ की नजर रहती है। माता-पिता की परिक्रमा करने से 33 कोटि देवी-देवताओं की परिक्रमा का पुण्य मिलता है।”

कथा प्रसंग में पं. मिश्रा ने पुरुष मृगा ऋषि की कथा और भगवान गणेश द्वारा माता-पिता की परिक्रमा कर प्रथम पूजनीय बनने की गाथा सुनाई। कथा के अंत में भगवान गणेश का विवाह रिद्धि-सिद्धि के साथ सम्पन्न कराया गया।
आयोजन के मुख्य यजमान नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिभा संतोष चौधरी रहीं। शिव शक्ति सेवा समिति द्वारा श्रद्धालुओं के लिए बैठने सहित समुचित व्यवस्थाएं की गईं थीं।




















