
यह केवल खाद की उपलब्धता की नहीं, बल्कि प्रशासन की जवाबदेही और संवेदनशीलता की भी कहानी है। किसानों ने पहले सोसायटी कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया और फिर मजबूर होकर NH-930 पर उतर आए। आंदोलनकारियों का कहना था कि कई बार संपर्क की कोशिश की गई, पर DMO तक किसानों की पुकार पहुंच ही नहीं सकी।
जब सवाल उठे, जवाब और भी चौंकाने वाले मिले।
विपणन अधिकारी सौरभ भारद्वाज ने कहा, “122 सोसायटी हैं… पत्रकारों और आम लोगों के भी कॉल आते हैं… कॉल सेंटर बनाना पड़ेगा, एक आदमी रखना पड़ेगा कॉल उठाने के लिए…”
इस बयान ने स्थिति को और भड़का दिया। सवाल उठने लगे कि
क्या पूरे छत्तीसगढ़ में केवल बालोद ऐसा जिला है जहां कॉल का बोझ इतना ज्यादा है?
क्या राज्य के अन्य जिलों में भी किसान अपनी गुहार लगाने कॉल सेंटर की कतार में खड़े हैं?
क्या एक प्रशासनिक अधिकारी से फोन उठाना भी अब ‘अलग से आदमी रखने’ का विषय बन गया है?

डीएमओ इस बयान पर किसान संगठनों से लेकर जिले के सत्ता पक्ष के कुछ प्रमुख नेताओं ने भी नाराजगी जताई है। पूर्व में भी ऐसे मामले की उच्चस्तरीय शिकायत हो चुकी है। फिर भी जब दोबारा वही संकट उठा, तो प्रशासन की ओर से डीएमओ की प्रतिक्रिया “प्रशासनिक उदासीनता” से भरी नजर आई।
एक बार फिर आंदोलन के बाद ही ट्रक पहुंचे, खाद बंटा और प्रशासन सक्रिय हुआ — पर सवाल यही है कि क्या किसानों की बात तब ही सुनी जाएगी जब वे सड़क पर उतरें?
DMO का बयान किसानों की पीड़ा पर मरहम नहीं, नमक की तरह असर कर रहा है। क्या ये प्रशासन की सोच में आई गिरावट का संकेत है? क्या जिला स्तर पर इतनी बेसिक संवादहीनता को भी कॉल सेंटर के सहारे टाला जा सकता है?
अब समय है, जब ज़मीनी सच्चाई को गंभीरता से समझा जाए… वरना हर समस्या के समाधान में आंदोलन ही एकमात्र विकल्प बनता जाएगा।




















