बालोद, छत्तीसगढ़ । जब शब्दों में श्रद्धा हो और वाणी में वेदांत की मिठास—तब कोई वक्ता मात्र प्रवक्ता नहीं रह जाता, वह जनमानस का पथप्रदर्शक बन जाता है। बालोद जिले के गव्यसिद्ध नाड़ी विशेषज्ञ और मानस मणि सम्मानित विद्वान डॉ. पुरुषोत्तम सिंह राजपूत एक बार फिर इसी भूमिका में हैं।
उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रीय मानस संगोष्ठी के लिए दूसरी बार आमंत्रण प्राप्त हुआ है। यह संगोष्ठी प्रतिवर्ष राष्ट्रसंत मोरारी बापू के सान्निध्य में आयोजित होती है, जो इस बार 28 से 31 जुलाई तक संत तुलसीदास जी की जन्मभूमि — राजापुर (उत्तर प्रदेश) में संपन्न हो रही है।
आध्यात्मिक साधना से राष्ट्रीय मंच तक का सफर
डॉ. पुरुषोत्तम राजपूत न केवल नाड़ी-चिकित्सा के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित नाम हैं, बल्कि रामचरितमानस, वेदांत, और धर्मदर्शन के गंभीर अध्येता व प्रभावी वक्ता भी हैं। ‘मानस मणि’ की उपाधि उनके भाषणों की गहराई और भक्ति की व्यापकता का प्रमाण है।
इस आयोजन में देशभर से चुनिंदा विद्वानों को आमंत्रित किया जाता है जो मानस, रामकथा और तुलसी दर्शन पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। यह संत तुलसीदास की जीवन-शैली, लोकचिंतन और उनके ग्रंथों की सार्वकालिकता को समझने का एक राष्ट्रीय मंच है।
हनुमान आराधना के साथ यात्रा का शुभारंभ
राजापुर के लिए प्रस्थान से पूर्व डॉ. राजपूत ने अपने आराध्य प्रभु श्री हनुमान जी का विधिवत पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। उन्होंने संक्षेप में कहा –
“मानस और वेदांत मेरे जीवन की धुरी हैं। तुलसीदास जी की जन्मभूमि पर जाकर कथा करना, मेरे लिए तप और उत्सव दोनों है।”
समाज की शुभकामनाएँ और गौरव का क्षण
डॉ. राजपूत के इस चयन पर बालोद जिले में हर्ष की लहर है। उन्हें बधाई देने वालों में तुलसी मानस प्रतिष्ठान के पूर्व अध्यक्ष गोपाल वर्मा, पूर्व उपाध्यक्ष मोहन लाल यादव, पुष्कर राजपूत, मणिकांत बघेल, योगेश्वर यादव, रमेश रावते, नेमी लाल साहू, और मुरलीधर सोनगैर जैसे गणमान्य नागरिक शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त आञ्जनेय नंदन सर्वसिद्ध हनुमान मंदिर समिति, गुरुकृपा बाल संस्कार मानस परिवार और मुक्ताश्रम न्यास जैसे संस्थाओं ने इस अवसर को जिले की आध्यात्मिक पहचान से जोड़ा है।
एक व्यक्ति, एक विचारधारा, और एक ध्येय – “मानस के माध्यम से समाजोत्थान”
पुरुषोत्तम सिंह राजपूत जैसे व्यक्तित्व न केवल जिले की पहचान बनते हैं, बल्कि समाज को यह भी दिखाते हैं कि धर्म, भक्ति और विद्वता का संगम जब कर्म में प्रकट होता है, तब वह जनचेतना का हिस्सा बन जाता है।
राजापुर में गूंजने वाली रामकथा की स्वर लहरियों में इस बार बालोद की भी एक मधुर ध्वनि शामिल होगी — यह हम सबके लिए गर्व की बात है।




















