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बंगाल के मजदूर छत्तीसगढ़ में ‘बांग्लादेशी’ घोषित! आधार-वोटर ID के बावजूद हिरासत में, संसद में उठा मामला

बंगाल के मजदूर छत्तीसगढ़ में ‘बांग्लादेशी’ घोषित! आधार-वोटर ID के बावजूद हिरासत में, संसद में उठा मामला

 रायपुर/कोलकाता | छत्तीसगढ़ के कोंडागांव ज़िले में काम करने गए पश्चिम बंगाल के आठ मज़दूरों को “संदिग्ध बांग्लादेशी” बताकर हिरासत में लिए जाने का मामला अब संसद तक पहुंच गया है। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने इस विषय को 13 जुलाई को संसद में उठाते हुए सवाल किया है कि जब इन मज़दूरों के पास भारत सरकार द्वारा जारी आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र मौजूद हैं, तो फिर उन्हें घुसपैठिया कहकर क्यों पकड़ा गया?इस प्रकरण ने देश में नागरिकता, पहचान और प्रशासनिक समन्वय को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

https://x.com/MahuaMoitra/status/1944764830818132292?t=z7sjazDiHT71QritbW9LKA&s=19

 

क्या है पूरा मामला?

पश्चिम बंगाल के नदिया ज़िले के थानारपाड़ा थाना क्षेत्र से संबंधित आठ मज़दूर — जो रोजगार की तलाश में छत्तीसगढ़ के कोंडागांव पहुंचे थे — को स्थानीय पुलिस ने “संदिग्ध विदेशी नागरिक” बताकर हिरासत में ले लिया।

इनकी पहचान इस प्रकार है:

क्र. नाम पिता का नाम मूल पता

1 सोहेल शेख मरजीम शेख मथुरापुर, PS थानारपाड़ा
2 सहाबुल शेख आदम शेख मथुरापुर, PS थानारपाड़ा
3 इनामुल मंडल तमेज मंडल मथुरापुर, PS थानारपाड़ा
4 रहीम शेख अब्दुल अजीज शेख मथुरापुर, PS थानारपाड़ा
5 सयान शेख सफीकुल शेख मथुरापुर, PS थानारपाड़ा
6 मेहेबूब शेख वारेश शेख मथुरापुर, PS थानारपाड़ा
7 मोनिरुल मंडल आनर मंडल लखनपुर, PS थानारपाड़ा
8 रिपोन शेख रमजान शेख मथुरापुर, PS थानारपाड़ा

इन सभी को कोंडागांव पुलिस ने बांग्लादेशी नागरिक होने के शक में हिरासत में रखा है, जबकि इनके पास आधार कार्ड और वोटर ID मौजूद हैं, जो भारतीय नागरिक होने का प्रमाण है। दस्तावेजों की कॉपियां थानारपाड़ा पुलिस की रिपोर्ट में संलग्न हैं।


बंगाल पुलिस ने क्या कहा?

थानारपाड़ा थाना (जिला: नदिया, पश्चिम बंगाल) द्वारा 13 जुलाई 2025 को जारी रिपोर्ट में कहा गया है: “जांच में यह स्पष्ट हुआ कि उपरोक्त सभी व्यक्ति ग्राम मथुरापुर और लखनपुर के स्थायी निवासी हैं। इनके पास वैध आधार और एपिक कार्ड मौजूद हैं। पुलिस रिकॉर्ड में इनके खिलाफ कोई आपराधिक प्रविष्टि नहीं है। अतः प्रमाणित किया जाता है कि ये सभी भारतीय नागरिक हैं।”इस रिपोर्ट पर थानाध्यक्ष SI Md. Eleyas का हस्ताक्षर है, जो इसे प्रमाणित करता है।

संसद में उठी आवाज़, महुआ मोइत्रा ने किया सवाल

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने इस पूरे मामले को संसद में उठाते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। उन्होंने ट्वीट किया: “8 गरीब मज़दूर जो मेरे लोकसभा क्षेत्र से छत्तीसगढ़ काम करने गए थे, उन्हें बांग्लादेशी बताकर हिरासत में लिया गया। आधार और वोटर ID होने के बावजूद उनकी नागरिकता पर सवाल उठाया गया। यह अन्याय है — मैंने आज संसद में यह मुद्दा उठाया है।”

यह बयान इस बात का सीधा संकेत है कि मामला अब केवल प्रशासनिक स्तर पर नहीं, बल्कि राजनीतिक और संवैधानिक बहस का हिस्सा बन गया है।

पहचान प्रमाणपत्र के बावजूद गिरफ्तारी?

सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब किसी व्यक्ति के पास सरकारी पहचान पत्र — जैसे आधार और वोटर कार्ड — मौजूद हैं, तो क्या उन्हें सिर्फ शक के आधार पर विदेशी नागरिक मानकर हिरासत में लिया जा सकता है?

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि यह न केवल न्यायिक सिद्धांतों का उल्लंघन है, बल्कि यह भारतीय नागरिकों की गरिमा और आज़ादी पर सीधा हमला है।

क्या यह धार्मिक या जातीय भेदभाव का मामला है?

हालांकि पुलिस या किसी भी सरकारी दस्तावेज़ में धार्मिक पहचान का कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन जिन आठ लोगों को हिरासत में लिया गया है, वे सभी एक विशेष समुदाय से हैं। सांसद महुआ मोइत्रा के अनुसार, यह कार्रवाई धार्मिक पहचान के आधार पर की गई प्रतीत होती है। उन्होंने इसे “Selective Targeting” यानी “चयनात्मक कार्रवाई” कहा है।

 प्रशासनिक लापरवाही या राजनीतिक दबाव?

इस घटना ने एक बार फिर देश में नागरिकता पहचान प्रक्रिया और राज्य सरकारों के बीच समन्वय पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जहां एक ओर पश्चिम बंगाल की पुलिस इन व्यक्तियों को भारतीय नागरिक मान रही है, वहीं छत्तीसगढ़ पुलिस उन्हें हिरासत में रखे हुए है।

अब सबकी निगाहें केंद्र सरकार और छत्तीसगढ़ प्रशासन पर हैं — क्या वे इस पर स्पष्टीकरण देंगे? क्या इन मजदूरों को रिहा किया जाएगा?

यह मामला केवल आठ मजदूरों की नागरिकता का नहीं, बल्कि भारत जैसे लोकतंत्र में ‘पहचान’ और ‘न्याय’ की परिभाषा का है। क्या हम केवल शक के आधार पर किसी की नागरिकता पर सवाल खड़ा कर सकते हैं?

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