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16 महीने बाद भी अधूरा बालोद रेलवे स्टेशन: अमृत भारत योजना की रफ्तार पर सवाल, तिरपाल के नीचे भीगते टिकट ले रहे यात्री

बालोद।केंद्र सरकार की अमृत भारत स्टेशन योजना का उद्देश्य रेलवे स्टेशनों को आधुनिक और सर्वसुविधा युक्त बनाना था, लेकिन बालोद रेलवे स्टेशन पर चल रहा निर्माण कार्य इस सपने को बदहाली में बदलता दिख रहा है। तय समय-सीमा बीते महीनों में गुम हो गई और यात्री अभी भी भीगते टिकट काउंटर और अधूरे प्लेटफॉर्म के बीच रोजाना की जद्दोजहद झेल रहे हैं।

तिरपाल बना अस्थायी छत, यात्री बेहाल
मानसून की बारिश शुरू हो चुकी है। स्टेशन के टिकट काउंटर पर अस्थायी तिरपाल के नीचे लोग घंटों लाइन में खड़े होकर टिकट लेने को मजबूर हैं। छाते और पॉलिथीन के सहारे खुद को बचाते हुए यात्री रेल सेवाओं की उम्मीद कर रहे हैं। कई यात्रियों ने कहा कि अगर अस्थायी इंतजाम भी ठीक से हो जाए तो कम से कम राहत मिले।

6 महीने का वादा, 16 महीने से अधूरा निर्माण
रेलवे विभाग और ठेकेदार की लापरवाही का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बीते वर्ष 2024 में जब इस स्टेशन का कायाकल्प शुरू हुआ था, तब कहा गया था कि छह महीने में स्टेशन नया रूप ले लेगा। आज 16 महीने गुजरने को हैं, और नतीजा—बिखरी ईंटें, अधूरे ढांचे और यात्रियों का टूटा धैर्य।

बालोद ही नहीं, दल्लीराजहरा भी बेहाल
योजना के तहत बालोद और दल्लीराजहरा दोनों स्टेशनों को स्मार्ट सुविधाओं से लैस किया जाना था। लेकिन दोनों ही स्टेशन अधूरे पड़े हैं। न तो पर्याप्त इंतज़ाम हैं, न शेड, न शौचालय की व्यवस्था, न बैठने की सुविधा। साफ है कि योजना की ज़मीन पर अमल में गंभीर खामी है।

योजना शानदार, अमल लाचार
करीब 15 करोड़ की लागत से बनने वाले इस स्टेशन का सपना बड़ा है—स्मार्ट टिकटिंग, बेहतर वेटिंग हॉल, स्वच्छ परिसर, दिव्यांगों के लिए रैंप व शौचालय—but सब बातें फिलहाल कागज़ों तक सिमटी हैं। रेलवे के स्थानीय अधिकारी भी स्टेशन की स्थिति को लेकर गोलमोल जवाब दे रहे हैं, जबकि रेल मंडल कार्यालय तक बात टालने का जरिया बन गया है।

जनता पूछ रही है सवाल: कब पूरा होगा स्टेशन?
रेल यात्रियों और आम नागरिकों की एक ही मांग है—काम को जल्द पूरा किया जाए। अगर 15 करोड़ में सुविधा का वादा है, तो जनता को सुविधाएं मिलनी भी चाहिए। सवाल यह भी है कि जब केंद्र सरकार की बड़ी योजनाओं को इस तरह धरातल पर लटकाया जाता है, तो जवाबदेही किसकी है?

यह खबर केवल स्टेशन के निर्माण की देरी की नहीं, बल्कि सरकारी योजना और ज़मीनी हकीकत के बीच की दूरी की भी है। जब आम जनता की असुविधा प्रशासनिक उदासीनता से जुड़ जाए, तो यह सिर्फ निर्माण कार्य नहीं, जन अधिकार का मुद्दा बन जाता है।

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