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“बालोद में भगवान जगन्नाथ की बहुदा रथ यात्रा – मौसी के घर से हुई ईश्वर की भव्य वापसी। भक्तिरस में डूबी बालोद की गलियाँ, जय श्रीहरि!”

बालोद में बजी श्रीहरि की रथ घंटियाँ: मौसी के घर से कपिलेश्वरधाम लौटे भगवान जगन्नाथ

बालोद।शंख, घंटा और हरिनाम संकीर्तन की गूंज के बीच शनिवार को बालोद नगरी भक्तिरस में डूब गई, जब भगवान श्री जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ नौ दिनों के दिव्य विश्राम के बाद कपिलेश्वर मंदिर लौटे। यह पावन अवसर था बहुदा रथ यात्रा का, जिसे लेकर शहर में उत्सव का माहौल छा गया।

महामाया मंदिर – जिसे भगवान की मौसी का घर माना जाता है – में ठहरने के बाद यह रथ यात्रा मानो एक भक्ति-पथ बन गई, जिसमें श्रद्धा की आंधी और आस्था की उमंग थी। जैसे ही रथ खिंचना शुरू हुआ, हर गली, हर मोड़ पर “जय श्री जगन्नाथ” के जयकारे गूंजने लगे।

हर दिल में था हरि – हर रथ में था रस

श्रद्धालुओं ने फूलों से रथों की आरती की, बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक ने भगवान के स्वागत में अपने-अपने भाव समर्पित किए। भजन मंडलियों की स्वर लहरियों और ढोल-नगाड़ों की थाप ने वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया।

यह केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि संस्कार, सनातन परंपरा और आत्मिक आनंद की साझी अभिव्यक्ति थी। मान्यता है कि इस यात्रा में भाग लेने मात्र से पुण्य की प्राप्ति होती है और जन्म-मरण के बंधन कटते हैं।

रथ खींचते भाव – साथ चलते विश्वास

इस मौके पर कपिलेश्वर मंदिर समिति के सदस्य, सेवकगण, स्थानीय नागरिक और दूर-दराज से आए श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल हुए। पूरा आयोजन सुव्यवस्थित रहा, जिसमें सेवा भाव और शांति दोनों का अद्भुत समावेश रहा।

मौसी के घर से अपने मूल निवास तक भगवान जगन्नाथ की वापसी, भक्तों के लिए एक आंतरिक यात्रा की तरह होती है – जहाँ ईश्वर को अपने हृदय में बसाने का अवसर मिलता है।

जहाँ रथ खिंचता है, वहाँ भाग्य भी बदलता है।

जहाँ हरि का नाम गूंजता है, वहाँ दुखों का विनाश होता है।”

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