रायपुर/बालोद। प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली मितानिनें अब अपनी मांगों को लेकर आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं। 7 जुलाई से प्रदेश भर की मितानिन, मितानिन प्रशिक्षक, ब्लॉक समन्वयक और हेल्प डेस्क फैसिलिटेटर कलम बंद, काम बंद हड़ताल पर जा रहे हैं।
इस हड़ताल का सीधा असर ग्रामीण क्षेत्रों में नवजात शिशु की देखभाल, टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की निगरानी, कुष्ठ एवं टीबी रोगियों की दवा पहुंचाने जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशनों पर पड़ेगा।
रायपुर के तूता में होगा प्रदेश स्तरीय धरना प्रदर्शन
प्रदेश स्वास्थ्य मितानिन संघ के आव्हान पर यह हड़ताल रायपुर के तुता में धरना प्रदर्शन के साथ शुरू होगी। बालोद जिला इकाई की अध्यक्ष महेश्वरी साहू ने बताया कि यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक सरकार मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लेती।
ये हैं मितानिनों की प्रमुख मांगे –
1. एनजीओ के माध्यम से कार्य नहीं करेंगे।
2. प्रशिक्षकों, समन्वयकों और फैसिलिटेटरों को नियमित वेतन।
3. मितानिनों को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि में वृद्धि।
4. राज्यांश 100% किया जाए।
5. 50% राशि वृद्धि का वादा पूरा हो।
6. प्रशिक्षकों की लंबित राशि 2024 की शीघ्र भुगतान।
संक्रमण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और टीबी मरीजों को भारी दिक्कत की आशंका
मितानिनों की अनुपस्थिति में ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं। गाँव की पहली स्वास्थ्य सहेली मितानिन ही है, जो हर घर तक सरकारी योजना की डोर जोड़ती है। ऐसे में गर्भवती महिलाओं की निगरानी, नवजात की देखभाल, टीकाकरण अभियान और टीबी-कुष्ठ के मरीजों की नियमित दवाएं रुक सकती हैं।
एकजुट हो रहे हैं जिलों के ब्लॉक
संघ के सलाहकार केशव शर्मा ने बताया कि हड़ताल में 7 जुलाई को रायपुर जिले के ब्लॉक शामिल होंगे। 8 जुलाई को धमतरी, 9 जुलाई को महासमुंद, 10 जुलाई को गरियाबंद और 11 जुलाई को बलौदाबाजार के ब्लॉक धरना प्रदर्शन में शामिल होंगे। अन्य जिलों की तारीखें जल्द घोषित की जाएंगी।
सरकार ने बुलाया वार्ता के लिए… लेकिन आंदोलन पर अडिग मितानिनें
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के उपसंचालक ने मितानिन संघ के प्रतिनिधियों को 7 जुलाई को वार्ता के लिए आमंत्रित किया है, लेकिन संघ का कहना है कि जब तक लिखित भरोसा नहीं मिलेगा, आंदोलन जारी रहेगा।
ग्रामीण जनता के लिए चेतावनी
यदि यह हड़ताल लंबी चली, तो ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं ठप होने की स्थिति आ सकती है। खासकर गर्भवती महिलाओं, नवजात बच्चों और संक्रामक बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए यह संकट की घड़ी होगी।




















