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तीन दिन… तीन हिरण… और अब भी सोया है सिस्टम! बालोद में हिरण बना कभी कुत्तों का शिकार, कभी लकड़बग्घों का ग्रास — वन विभाग की नाकामी उजागर

 

 

बालोद, छत्तीसगढ़। जंगल का मेहमान अब गांव की गलियों में दम तोड़ रहा है। बीते तीन दिनों में बालोद जिले में तीन हिरणों की मौत ने वन्य प्राणी संरक्षण की हकीकत उजागर कर दी है। कहीं आवारा कुत्तों ने दौड़ाकर मारा, तो कहीं जंगल के लकड़बग्घे ने नोच डाला। लेकिन सवाल यह है — वन विभाग क्या सिर्फ पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार के लिए रह गया है?

ताजा मामला: हिरण को दौड़ाकर मारा कुत्तों ने

घटना मंगलवार सुबह की है। ग्राम घोटिया में जंगल से भटककर आए करीब दो साल के नर हिरण को गांव के कुत्तों के झुंड ने दौड़ा लिया। हिरण ने कई गलियों में जान बचाने की कोशिश की, लेकिन गिरने और चोट लगने से उसकी मौत हो गई।
ग्रामीणों ने बताया कि करीब 5.30 बजे हिरण गांव में भागता नजर आया। कुत्तों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया और अंततः वह घायल होकर गिर पड़ा।

सूचना पर पहुंचे दल्ली रेंज के रेंजर मूलचंद शर्मा ने पशु चिकित्सा टीम की मदद से पोस्टमार्टम कराया और विधिवत अंतिम संस्कार किया।

तांदुला डेम बना मौत का जलाशय

इससे पहले 28 जून को तांदुला डेम में एक हिरण का शव तैरता मिला था। जांच में पता चला कि लकड़बग्घे के हमले से डरकर हिरण पानी में कूद गया और डूब गया। उसी क्षेत्र में एक अन्य हिरण को जंगली जानवर ने मारकर खा लिया था।
वन विभाग के मुताबिक दोनों नर हिरणों पर लकड़बग्घे ने हमला किया था — एक का शिकार हुआ और दूसरा डर से डूब मरा।

सवालों के घेरे में वन विभाग

पिछले कुछ महीनों में यह पहला मामला नहीं जब हिरणों की जान गई हो। कई बार कुत्तों द्वारा हिरण को शिकार बनाए जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लेकिन वन विभाग की ओर से कोई ठोस कार्रवाई या सतर्कता नजर नहीं आती।

गांवों से सटे जंगलों में वन्यजीव क्यों भटक रहे हैं?

कुत्तों की संख्या पर कोई नियंत्रण क्यों नहीं?

वन विभाग द्वारा रेस्क्यू या सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं किए गए?

क्या वन विभाग सिर्फ कागजों में वन्यजीवों की रक्षा कर रहा है?

संरक्षण नहीं, सिर्फ संस्कार!”

तीन दिनों में तीन मासूम हिरणों की जान चली गई और विभाग ने सिर्फ पोस्टमार्टम और अंतिम संस्कार की रस्म निभाई।
यह नाकामी नहीं, एक सिस्टम की संवेदनहीनता है।

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