वर्ल्ड विटिलिगो डे पर विशेष रिपोर्ट “सफेद रंग — एक अलग दृष्टिकोण”
लेख : संगीता निर्मलकर, बालोद
बालोद – 25 को वर्ल्ड विटिलिगो डे (World Vitiligo Day) के रूप में मनाया जाता है — एक ऐसा दिन जो न केवल एक त्वचा विकार के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है, बल्कि उससे जूझ रहे लोगों के आत्म-सम्मान को संबल देने का दिन भी है।
सफेद रंग को सामान्यतः शांति, पवित्रता और सादगी का प्रतीक माना जाता है, पर जब यही रंग किसी व्यक्ति की त्वचा पर ‘सफेद दाग’ के रूप में उभरता है, तो समाज का नजरिया पलट जाता है। इसे देखने की दृष्टि बदल जाती है — और अफवाहों, भ्रांतियों, तानों और तिरस्कार का अंधेरा उस उजले रंग पर छा जाता है।
विटिलिगो क्या है?
यह एक त्वचा संबंधी विकार है जिसमें मेलानोसाइट्स (रंगद्रव्य उत्पादक कोशिकाएं) नष्ट हो जाती हैं, जिससे त्वचा पर दूधिया सफेद चिह्न दिखने लगते हैं। यह न तो छूत की बीमारी है, न ही किसी पाप या पितृदोष का परिणाम — यह एक चिकित्सकीय स्थिति है, जिसका इलाज और मैनेजमेंट संभव है।
भारत में स्थिति:
भारत में विटिलिगो के मामलों का अनुपात लगभग 8.8% है, जबकि छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 0.5% से 1% के बीच है। यह किसी भी उम्र, जाति, लिंग या वर्ग में हो सकता है, और अधिकांश मामलों में इसकी शुरुआत 20 वर्ष से पहले होती है।
पर समाज का रवैया ज्यादा तकलीफदेह
बीमारी से अधिक पीड़ा तब होती है जब समाज का व्यवहार असंवेदनशील हो। “छूत की बीमारी”, “कर्मों का फल”, “गाय-जैसी दिखती है” जैसे अपमानजनक शब्द किसी के आत्मबल को तोड़ सकते हैं। यह न केवल विटिलिगो से पीड़ित व्यक्ति को सामाजिक रूप से अलग-थलग कर देता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
“मैं भीड़ का हिस्सा नहीं, मेरी अलग पहचान है”
विटिलिगो से जूझ रही बालोद निवासी संगीता निर्मलकर का यह कथन आज सैकड़ों लोगों की आवाज बन गया है। वे कहती हैं —
“जब कोई मुझसे पूछता है कि सफेद दाग कैसे हुआ, तो मैं कहती हूँ — मैं अलग हूँ, मेरी पहचान अलग है। और हर पहचान सुंदर होती है। “वे आगे कहती हैं, “मैं कोई लेखिका नहीं, कोई सामाजिक कार्यकर्ता नहीं। सिर्फ एक आम इंसान हूँ, जो चाहती है कि उसे और उसके जैसे हजारों लोगों को सामान्य जीवन जीने दिया जाए — बिना तिरस्कार, बिना शर्मिंदगी के।”
संदेश साफ है — समझ बढ़ाइए, तिरस्कार नहीं
वर्ल्ड विटिलिगो डे एक अवसर है — समाज को समझाने का कि यह रोग नहीं, परिस्थिति है। यह अपशकुन नहीं, एक जैविक स्थिति है। और सबसे अहम बात — इससे पीड़ित व्यक्ति भी उतना ही योग्य, सुंदर और सम्मान का अधिकारी है जितना कोई और।
संवेदनशील बनिए, सहायक बनिए — क्योंकि रंग कोई भी हो, आत्मा का सौंदर्य अनमोल होता है।




















