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त्याग की राह पर इब्राहिम, आज भी क्यों याद है वो दिन… क्या है इस पर्व का महत्व… पढ़ें प्रदेशरुचि पर

 

बालोद, इस्लाम धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक ईद-उल-अजहा (बकरीद) को शनिवार को बालोद जिला मुख्यालय में आस्था, उत्साह और भाईचारे के वातावरण में मनाया गया। शहर के नया बस स्टैंड स्थित ईदगाह मैदान में मुस्लिम समाज के सैकड़ों लोगों ने विशेष नमाज अदा की और देश-प्रदेश में अमन-चैन, सुख-समृद्धि के लिए दुआ मांगी।

गले मिलकर दी बकरीद की मुबारकबाद

नमाज अदा करने के बाद मुस्लिम भाइयों ने एक-दूसरे को गले लगाकर ईद की बधाइयाँ दीं। इमाम साहब ने खुतबे के दौरान इंसानियत, एकता और सौहार्द का संदेश दिया और दुनिया में शांति और भाईचारे के लिए दुआ की।

जनप्रतिनिधियों और सामाजिक नेताओं ने दी शुभकामनाएं

इस मौके पर विधायक संगीता सिन्हा, नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिभा चौधरी, पार्षद विनोद शर्मा, जिला कांग्रेस अध्यक्ष चंद्रेश हिरवानी, शहर कांग्रेस अध्यक्ष अंचल साहू भी ईदगाह पहुंचे और मुस्लिम समाज के लोगों को ईद की मुबारकबाद दी।

भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश महामंत्री शाहिद खान ने कहा, “ईद-उल-अजहा का पर्व हमें त्याग, सेवा और समाज के प्रति समर्पण की भावना सिखाता है। यही संदेश हमें आपसी प्रेम और मेल-जोल बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है।”

भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के जिलाध्यक्ष अकबर तिगाला ने कहा, “यह पर्व न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि इंसानियत, एकजुटता और कुर्बानी की मिसाल भी है। बालोद में जिस तरह सभी वर्गों ने मिलकर इसे मनाया, वह काबिल-ए-तारीफ है।”

कांग्रेस नेता दाऊद खान ने कहा,“ईद-उल-अजहा हमें सिखाता है कि जब नीयत पाक हो, तो हर कुर्बानी कबूल होती है। यह पर्व परस्पर भाईचारे और समरसता का प्रतीक है।”

मस्जिदों में सजी रौनक, दी गई दर्जनों कुर्बानियां

ईद-उल-अजहा के मौके पर मरारपारा स्थित जामा मस्जिद को रंग-बिरंगी झालरों से भव्य रूप से सजाया गया। ईदगाह के अलावा जामा मस्जिद में भी विशेष नमाज अदा की गई। नमाज के बाद दर्जनों बकरों की कुर्बानी दी गई, जो कि इस पर्व की मूल परंपरा का हिस्सा है।

हज़रत इब्राहिम की कुर्बानी की याद

पर्व का धार्मिक महत्व हज़रत इब्राहिम अलैहि अस्सलाम की उस ऐतिहासिक कुर्बानी से जुड़ा है, जब अल्लाह ने उनकी परीक्षा लेते हुए अपने पुत्र हज़रत इस्माइल अलैहि अस्सलाम को कुर्बान करने का आदेश दिया। उनकी सच्ची नीयत और समर्पण को देखकर खुदा ने बेटे की जगह एक दुम्बा (अरबी बकरा) भेजा। उसी कुर्बानी की याद में आज यह पर्व मनाया जाता है।

मेल-जोल और भाईचारे का माहौल

त्योहार के मौके पर मुस्लिम समाज के लोग अपने-अपने घरों में मेहमानों का स्वागत करते नजर आए। सभी मोहल्लों और गलियों में ईद की खुशियां छाई रहीं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर चेहरा मुस्कान से भरा हुआ दिखा।

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